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Supreme Court News: भारत सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, 43 रोहिंग्या शरणार्थियों को जबरन समुद्र में फेंकने का गंभीर आरोप

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 14 May 2025, 12:00 AM | Updated: 14 May 2025, 12:00 AM

Supreme Court News: भारत में रोहिंग्या शरणार्थियों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण याचिका दायर की गई है। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि 43 रोहिंग्या शरणार्थियों, जिनमें बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग शामिल हैं, और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोग जैसे कैंसर के मरीजों को भारत सरकार ने जबरन म्यांमार निर्वासित किया। आरोप है कि इन शरणार्थियों को अंतरराष्ट्रीय जल में फेंककर म्यांमार भेजा गया, जिससे उनके जीवन और सुरक्षा को गंभीर खतरा हुआ।

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सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई- Supreme Court News

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह शामिल हैं, इस मामले की सुनवाई कर रही है। यह सुनवाई शरणार्थियों के निर्वासन और उनके रहने की स्थिति से संबंधित मामलों पर आधारित है। याचिका में यह भी दावा किया गया कि 7 मई 2023 की रात को दिल्ली पुलिस अधिकारियों ने संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (UNHCR) कार्ड रखने वाले शरणार्थियों को गिरफ्तार किया और उन्हें निर्वासित कर दिया। इस कार्रवाई के बावजूद अदालत ने मामले को सूचीबद्ध किया था, जिससे मामला और भी संवेदनशील हो गया।

सरकार का पक्ष

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 8 अप्रैल, 2021 के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा कि विदेशियों को कानून के तहत निर्वासित किया जा सकता है। इस आदेश के तहत, न्यायालय ने कोई अंतरिम निर्देश पारित करने से इनकार करते हुए मामले को 31 जुलाई 2023 तक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया। हालांकि, सरकार की इस दलील के बावजूद, याचिकाकर्ताओं ने इस प्रक्रिया को असंवैधानिक बताया और इसे रोकने की मांग की।

शरणार्थियों की हिरासत और निर्वासन का विवरण

नई दायर की गई याचिका में आरोप है कि पुलिस अधिकारियों ने शरणार्थियों से बायोमेट्रिक डेटा एकत्र किया और उन्हें हिरासत में लिया। इसके बाद, उन्हें वैन और बसों में ले जाया गया और 24 घंटे तक विभिन्न पुलिस थानों में रखा गया। फिर उन्हें दिल्ली के इंद्रलोक डिटेंशन सेंटर में भेजा गया, जहां से उन्हें पोर्ट ब्लेयर भेजा गया। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि इन शरणार्थियों को धोखे से म्यांमार भेज दिया गया, जबकि उन्होंने इंडोनेशिया जाने की इच्छा जताई थी।

शरणार्थियों की स्थिति और आरोप

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि शरणार्थियों को हाथों में हथकड़ियां डालकर और आंखों पर पट्टी बांधकर नौसेना के जहाजों पर ले जाया गया। यात्रा के दौरान, 15 साल के बच्चे, 16 साल की नाबालिग लड़कियां, 66 साल तक के बुजुर्ग और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोग भी शामिल थे। आरोप है कि इन शरणार्थियों के परिवारों को जबरन विभाजित किया गया और बच्चों को उनकी माताओं से अलग किया गया। शरणार्थियों को यह बताया गया था कि उन्हें इंडोनेशिया भेजा जाएगा, लेकिन अंत में वे म्यांमार पहुंच गए, जिससे उनकी सुरक्षा और जीवन को खतरा हो गया।

कानूनी मांगें और मुआवजे की मांग

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से यह आग्रह किया कि इस जबरन निर्वासन को असंवैधानिक घोषित किया जाए और भारत सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह इन शरणार्थियों को वापस दिल्ली लाए और उन्हें हिरासत से रिहा करे। याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग की कि भारत सरकार को यह निर्देश दिया जाए कि वह UNHCR कार्डधारक शरणार्थियों को गिरफ्तार या हिरासत में न ले। साथ ही, उन्होंने शरणार्थियों के साथ सम्मान और गरिमा के साथ व्यवहार करने की मांग की और उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन न करने की अपील की। याचिका में यह भी कहा गया कि प्रत्येक निर्वासित शरणार्थी को 50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए और UNHCR कार्डधारकों को निवास परमिट जारी करने की प्रक्रिया फिर से शुरू की जाए।

भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि हालांकि भारत 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, लेकिन कई न्यायिक निर्णयों में गैर-वापसी के सिद्धांत को स्वीकार किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार, किसी शरणार्थी को उसके मूल देश में खतरे का सामना करने से बचाने के लिए निर्वासित नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस सिद्धांत का पालन भारत को भी करना चाहिए, ताकि शरणार्थियों के अधिकारों का उल्लंघन न हो।

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