साध्वी सावित्री बाई फुले : अपने नाम के आगे साध्वी लगा, खुद को बुद्धिस्ट बताने वाली दलित महिला

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 29 Nov 2023, 12:00 AM | Updated: 29 Nov 2023, 12:00 AM

Sadhvi Savitri Bai Phule : आज हम एक ऐसी दलित महिला के बारे में बात कर रहे है जिन्होंने खेत में मजदूरी करने से लेकर बीजेपी सांसद के पद से इस्तीफा वाली नेता तक का सफ़र तय किया है. जिसे छह साल की उम्र में विवाह के लिए मजबूर किया गया, लेकिन बड़े होने पर उसने ससुराल पक्ष वालों को बुलाकर सन्यास लेने की अपनी इच्छा बताई. फिर अपनी छोटी बहन की शादी अपने पति से कराकर खुद बहराइच के जनसेवा आश्रम से जुड़ीं गई. जी हाँ.. हम बात कर रहे है साध्वी सावित्री बाई फुले की,  जो अपने नाम के आगे साध्वी लगा, खुद को बुद्धिस्ट बताती है. जो भगवा रंग पहनकर हिन्दू धर्म को अपने निशाने पर रखती है. जो बीजेपी में रहते हुए लगातार आरक्षण और दलित उत्पीड़न जैसे मसलों पर पार्टी को सवालों के घेरे में खड़ी करती रही.

आईए आज हम आपको उन चुनिंदा दलित सांसदों में शामिल होने वाली दलित महिला नेता के बारे में जो अपनी पार्टी से नाराज थे.

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दलित महिला – साध्वी सावित्री बाई फुले 

फुले ने अपने एक इंटरव्यू में बताया है की उन्हें बचपन से ही समाज के लिए सेवा करनी थी, इसीलिए एक बार वह 6 दिसंबर, 1995 को लखनऊ में हो रहे एक सामाजिक आन्दोलन में गई थी, जहाँ फुले को आंदोलन के दौरान पीएसी की गोली लग गई थी, जिसके बाद उन्हें लखनऊ जेल के हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, 24 घंटे के बाद होंश में आने पर उन्होंने तय कर लिया कि अब सिर्फ समाज सेवा करनी है.

जेल से लौटने के बाद फुले ने अपने पिता से बात की और ससुराल पक्ष वालों को बुलाकर अपनी इच्छा जाहिर की. सबकी सहमति के बाद अपनी सगी छोटी बहन की शादी अपने पति से कराकर वे पूरी तरह से संन्यास धारण कर बहराइच के जनसेवा आश्रम से जुड़ गईं थी. और समाज के नाम आपन आजीवन कर दिया था साथ ही कभी भी दूसरी शादी न करने की भी कसम खाई.

फुले के राजनीतिक जीवन की शुरुआत

फुले ने अपने इंटरव्यू में बताया की उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत 2001 में हुई थी, जब उन्होंने निर्दलीय जिला पंचायत के चुनाव लगे थे और साथ ही जीत भी हासिल की थी. जिसके बाद फूले 2005 और 2010 में भी इस पद के लिए चुनी गई थी और 2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की टिकट पर बलहा से चुनाव जीत कर पहली बार विधायक बनी और 2014 में पहली बार सांसद भी बनी. लेकिन कुछ समय बाद फूले ने बीजेपी से भी इस्तीफा दे दिया थे. हम आपको बता दे की बीजेपी से पहले फूले बसपा की सदस्य थी.

कहते है की राजनीति में रहने के लिए धन-बल और राजीतिक संरक्षण बहुत जरूरी है लेकिन फूल का कहना है कि पहले जन-बल फिर कोई ओर बल चुनाव में मायने रखता है. बसपा, बीजेपी और कांग्रेस जैसी पार्टियों से इस्तीफा दे अभी भी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा खुद की बेबाकी का सबूत दिया. फूल पिछड़े वर्ग से जुड़े हर मामले में अपने बयाँ देती है चाहे वे डॉ. बीआर आंबेडकर की मूर्तियां तोड़ने की घटनाएं हों, दलित को घोड़ी पर नहीं चढ़ने देने के मामले हों, हनुमान जी को दलित बताने का मामला हो.

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