Sikhism in Rishikesh: उत्तराखंड में एक जिला है चमोली। इस चमोली जिले में हिमालय की गोद में करीब 4632 मीटर यानी कि 15,192.96 फुट की ऊँचाई पर एक बर्फ़ीली झील के किनारे सात पहाड़ों के बीच बना है सिखो का एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा गुरुद्वारा हेमकुंड साहिब। दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने अध्यात्मिकता को बढ़ावा देने के लिए यहां करीब 7 सालों तक साधना की थी। सिखो के लिए चमोली आने से पहले ऋषिकेश तक का सफर तय करना अहम है। ऋषिकेश जहां से पवित्र हेमकुंड साहिब तक जाने का सफर शुरू होता है और साथ ही यहां होते है पवित्र गोबिंदघाट के दर्शन।
सिख धर्म को मानने वाले के लिए ऋषिकेश उन अहम स्थानों में से एक है जो उनके लिए बेहद पवित्र और उनकी आस्था से जुड़ा हुआ है। ऋषिकेश ही वो बिंदु है जो सिखो को अपने दशम गुरु के करीब ले जाने का काम करता है, जिस कारण यहां हिंदुओं के साथ साथ सिख समुदाय भी काफी सक्रिय रूप से रहते है। अपने इस वीडियो में हम ऋषिकेश में मौजूद सिखिज्म की कहानी को जानेंगे, साथ ही कैसे ऋषिकेश सिखो के लिए इतना अहम स्थान बन गया। क्या है ऋषिकेश में सिख धर्म के फलने फूलन की कहानी।
ऋषिकेश के बारे में पूर्ण जानकारी
भारत के प्रमुख चार धामों के अलावा देवभूमि उत्तराखंड में भी प्रमुख चार धाम मौजूद है जिन्हें छोटे चार धाम कहा जाता है इसमें बद्रीनाथ केदारनाथ गंगोत्री और यमुनोत्री शामिल है इन चारों स्थान पर पहुंचने के लिए ऋषिकेश इनका केंद्र बिंदु है। ऋषिकेश उत्तराखंड की राजधानी देहरादून का एक नगर है। ऋषिकेश को दुनिया भर में “गढ़वाल हिमालय का प्रवेश द्वार” और “विश्व की योगनगरी” के रूप में जाना जाता है। जो कि पूरी तरह से एक शाकाहारी और शराब मुक्त नगर है। ऋषिकेश नाम रैभ्य ऋषि को समर्पित है जिन्होंने यहां तपस्या की थी।
भगवान विष्णु यहां प्रगट हुए थे, रैभ्य ऋषि की तपस्या से प्रसन्न हो कर विष्णु जी ने उन्हें ऋषिकेश नाम दिया था, जिसका मतलब होता है सभी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला। पहले इस स्थान को कुब्जाम्रक के रूप में जाना जाता है, जो बाद में रैभ्य ऋषि के नए नाम ऋषिकेश के ही नाम से प्रचलित हुआ। ऋषिकेश का क्षेत्रफल 11.5 वर्ग किलोमीटर है वहीं इसकी आबादी 2011 के अनुसार 102138 के आसपास थी। ऋषिकेश हिंदुओं के साथ साथ सिखो का भी प्रमुख धार्मिक स्थल है। जहां हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं, वहीं हेमकुंड साहिब गुरूद्वारा जाने की यात्रा भी आसान नहीं होती..इसीलिए सिखों के साथ साथ हिंदुओ के लिए भी ये स्थान बेहद पवित्र औऱ अहम माना जाता है।
ऋषिकेश में सिख धर्म
जब ऋषिकेश में सिख धर्म के फलने फूलने की बात होती है तो इसका इतिहात सिखों के पहले गुरु गुरुनानक देव जी से जुड़ा है। जो कि अपनी पहली उदासी के दौरान 1504 में हरिद्वार और ऋषिकेश की यात्रा पर आये थे। यहां गुरु साहिब ने गंगा किनारे लोगो को बाहरी आडंबरी कर्मकांड को छोड़ कर सच्चे परमात्मा की भक्ति करते हुए सच्चे मार्ग पर चलने का उपदेश दिया था। अपनी हिमालयी क्षेत्र में की गई सभी यात्राओं में ऋषिकेश की यात्रा काफी अहम मानी जाती है। यहां उन्होंने गंगा नदी के पानी को महत्व देने को लेकर प्रचार प्रसार किया था, लेकिन साथ ही उन्होंने पाखंड के प्रभाव से निकल कर सच के रास्ते को जानने और समझने की सीख दी थी।
गुरू साहिब की तपस्थली
वहीं दशम गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी के पिछले जन्म के तप से जुड़ा है। कहा जाता है गुरु साहिब ने अपनी आत्मकथा बचित्र नाटक या फिर जिसे बछित्तर नाटक में ये खुद लिखा था कि ऋषिकेश से पास चमौली जिले में सप्त शृंग नाम के स्थान पर उन्होंने साल सालों तक तप किया था, पिछले जन्म में वो दुष्ट दमन नाम के ऋषि थे, जिन्होंने घोर तपस्या की थी और ईश्वर के आदेश पर लोगो को धर्म के मार्ग पर ले जाने के लिए उन्होंने गुरु गोबिंद सिंह जी के रूप में जन्म लिया था। इसलिए इस स्थान को गुरू साहिब की तपस्थली भी कहा जाता है, यहां पहुंचने के लिए सिख श्रद्धालुओं को ऋषिकेश के गोविंदघाट से करीब 19 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी पड़ी है।
उल्टे कमल के आकार गुरुद्वारा
हिम यानि की बर्फ के बीच बना ये गुरुद्वारा केवल गर्मियों में ही खुलता है क्योंकि बाकि के समय यहां पर बर्फ जमी रहती है। साल 1936-1937 के आसपास संत सोहन सिंह ने गुरु साहिब की आत्मकथा से प्रेरित होकर हेमकुंड झील के किनारे गुरुद्वारे का निर्माण कराया था, जहां पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब को स्थापित किया गया था। ये गुरुद्वारा उल्टे कमल के आकार का बना हुआ है। इसलिए ऋषिकेश सिखों के लिए भी बेहद पवित्र नगरी है, आकड़ो की माने तो ऋषिकेश की नगर पालिका सीमा में करीब 1100 सिख रहा करते थे तो वहीं ऋषिकेश तहसील में करीब 5100 सिख रहते थे।
धार्मिक और सामजिक कार्यक्रम
ये आकड़े 2011 के है। सिख यहां अल्पसंख्यक है, लेकिन एक ताकतवर कम्युनिटी है। गुरुद्वारा हेमकुंड साहिब के अलावा यहां गुरुद्वारा श्री गुरुनानक सभा और होली सरोवर गुरुद्वारा भी मौजूद है, जो काफी भव्य है.. ये गुरुद्वारे यहां सिख धर्म की मजबूत छवि की कहानी कहते है, जो बताते है कि ऋषिकेश में सिखों का वाकई में क्या स्थान है। गुरुद्वारो में नियमित प्रार्थना सभायें, लंगर किये जाते है, ताकि सिख धर्म से जुड़ी परंपराएं सदैव चलती रहे। सिख कम्युनीटी खुद इन गुरुद्वारों की देखरेख करती है साथ ही सभी धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों का संचालन भी वहीं करते है.. आपको ऋषिकेश में सिख धर्म की कहानी कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।






























