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Poor to rich son-in-law: रिच दामाद, पुअर दामाद: रॉबर्ट वाड्रा की जीरो से करोड़ों कमाने की कला!

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 21 Apr 2025, 12:00 AM | Updated: 21 Apr 2025, 12:00 AM

poor to rich son-in-law: साल 1997 में रॉबर्ट कियोसकी की एक फेमस बुक आई थी..रिच डैड, पुअर डैड। इस किताब में एक पिता किस तरह से केवल अपनी फाइनेंशियल समझ से गरीब से करोड़पति बनता है, बेहद ही खूबसूरती से बताया गया है, लेकिन कहते है न कि समझ के साथ साथ अगर किस्मत भी मेहरबान हो और साथ ही मिले पॉलिटिकल पावर, फिर तो सोने पर सुहागा ही हो जाए। कुछ ऐसी ही किस्मत मिली है पूर्व यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी (sonia gandhi) के दामाद और पार्टी के जेनेरल सेकेरेट्री प्रियंका गांधी (priyanka gandhi) के पति  रॉबर्ट वाड्रा को। रॉबर्ट वाड्रा (Robert vadra) ने प्रियंका गांधी के पति होने का पूरा फायदा उठाया, एक पुअर दामाद से रिच दामाद बनने का सफर वाड्रा ने मजह चंद सालों में पूरा कर लिया जिसके लिए लोगो को दशकों तक जूते घिसने पड़ते है। कैसे बने वाड्रा पुअर टू रिच दामाद जानते है इस रिपोर्ट में ।

रॉबर्ड वाड्रा का इतिहास

रॉबर्ट वाड्रा में जब 1997 में प्रियंका गांधी से शादी की तब पहली बार वो मीडिया की सुर्खियों में आए थे, हालांकि ये रिश्ता वाड्रा परिवार को पसंद नहीं था। नतीजा ये हुआ कि वाड्रा परिवार से उनका रिश्ता टूट गया। वाड्रा ने खुल तौर पर अपने परिवार से अलग होने की पुष्टि की थी। साल 2012 में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने यूपीए और वाड्रा पर जनलोकपाल को लागू करने की मांग के दौरान आरोप लगाया था। उनके अनुसार वाड्रा ने कई सौ एकड़ जमीन कोड़िये के भाव खरीद कर उन्हें करोड़ो रूपयों में बेचा है।

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वाड्रा ने क्यों खरीदी बंजर जमीन

वाड्रा पर आरोप लगे है कि 2011 में उन्होंने बिकानेर में ग्रिड स्टेशन के पास बंजर रेगिस्तान की जमीन 65000 रूपय प्रति हेक्टेयर खरीदी थी, जबकि उसकी कीमत मात्र 25000 रूपय प्रति 1 हेक्टेयर थी। एक बंजर जमीन की इतनी ज्यादा कीमत मिलना पहले तो जमीन के मालिकों को थोड़ा जा अजीब लगा था। जमीन के नीचे किसी खजाना होने का भी एंदेशा हुआ और शुरु कर दी खुदाई लेकिन जब हाथ कुछ नहीं लगा तो जमीन की 2.5 गुणा कीमत को फायदा का सौदा मान कर जमीन बेच दी। इस राज से भी कुछ समय बाद ही पर्दा उठ गया।

कैसे करोड़ो कमाए वाड्रा ने

दरअसल 2011 में तत्कालिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सौर और पवन उर्जा को भारत के एनर्जी सेक्टर का भविष्य बताया था। इस ऐलान के बाद ही नेशनल सोलर मिशन शुरु हुआ जिसके तहत नीजि निवेशकों को भी आजादी दी गई कि वो अपना नीजि सौर उर्जा की परियोजनाएं स्थापित कर सकते है। इस दौरान 2010 से 2012 के बीच राजस्थान में भी सौर उर्जा परियोजना के लिए दो बार बोलियां लगाई गई थी। परियोजना की सफलता के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होती है सूरज की तेज रोशनी और ग्रिड स्टेशन का पास होना। परियोजना की घोषणा के बाद समझ आया वाड्रा का असली प्लान।

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मिला पॉलिटिकल ताकत का फायदा

2011 में राजस्थान में कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे अशोक गहलोत। गहलोत और गांधी परिवार के बीच के करीबी रिश्तें जगजाहिर है। ऐसे में अचानक रॉबर्ट वाड्रा का इतनी ज्यादा तादाद में जमीन खरीदने की असली चाल समझ आ गई थी। चुंकि उसने पास राजनीतिक पावर थी, और राजस्थान सीएम से पहले ही उन्हें बीकानेर में शुरु होने वाले सौर परियोजना के बारे में जानकारी मिली होगी, जिसका फायदा वाड्रा ने उठाया।

वाड्रा ईडी के शिकंजे में

जमीन को कौड़ियो के भाव खरीदने और उन्हें कई गुणा ज्यादा में बेचने को लेकर ईडी ने वाड्रा पर शिकंजा कसा। ईडी ने एक रिपोर्ट में बताया कि वार्डा के नाम पर बीकानेर के केवल एक सबडिविजन में ही करीब 275 एकड़ जमीन खरीदी गई है। जिन्हें कई गुणा ज्यादा में बेचा गया था। जैसे कि वाड्रा की कंपनी स्काई लाइट रियल्टी ने 30 हेक्टेयर जमीन के लिए 4.45 लाख रुपए दिए थे, लेकिन इसी जमीन को कम्पनी ने बोली लगाए गए निवेशकों को 2 करोड़ रुपयों में बेचा था। इतना ही नहीं स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी ने डीएलफ के साथ मिलकर कई करोड़ो रूपय का घोटाला किया।

स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी का सच

एक रिपोर्ट के अनुसार स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी (skylight hospitality) ने हरियाणा के मानेसर में 3.5 एकड़ जमीन थी लेकिन डीएलएप रियल स्टेट(DLF Real estate) ने अचानक इस जमीन की कीमत 50 करोड़ रूपय बताई और जमीन की डील से पहले ही वाड्रा की कंपनी को 50 करोड़ रूपय एडवांस दे दिया। कहा तो ये भी जा रहा है कि इन्ही पैसो से बीकानेर के पास जमीन खरीदी गई थी। डीएसएफ के अनुसार मानेसर की ये जमीन व्यवसाइक रूप से काफी मुनाफे वाली थी। ये डील 2012 में पूरी हुई थी जिसके लिए डीएलफए ने कुल 58 करोड़ रूपय वाड्रा की कंपनी दो दिए थे। इस दौरान वाड्रा की कंपनी स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी की वैल्यू मात्र 1 लाख रूपय थी, फिर अचानक इस कंपनी ने करोड़ो रूपय का भुगतान कैसे किया। इस मामले में ही वाड्रा पर मनी लॉंड्रिग का आरोप है, जिसपर कार्यवाई जारी है।

वाड्रा के बारे में ये कहना गलत न होगा कि लक के साथ साथ अगर राजनीतिक ताकत मिल जाए तो व्यक्ति फर्श से अर्श का सफर बहुत आसानी से तय कर सकता है। आपकी इस पुअर टू रिच दामाद को लेकर क्या राय है।

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