राहुल ‘मैकेनिक’, केसीआर ‘डॉन’, केजरीवाल ‘विज्ञापन देवता’ लेकिन मोदी को हराना आसान नहीं, समझिए कैसे ?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 28 Jun 2023, 12:00 AM | Updated: 28 Jun 2023, 12:00 AM

Real Story of Oppostion Unity in Hindi – देश की राजनीति में भाजपा के वर्चस्व को नकारा नहीं जा सकता है. 2014 में धमाकेदार जीत हासिल करने के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपना ही रिकॉर्ड तोड़ डाला था और 302 सीटों पर जीत हासिल की थी. पीएम नरेंद्र मोदी को जनता का अपार समर्थन मिला था. मोदी लहर ऐसी थी कि भाजपा के कई गए-गुजरे प्रत्याशी भी मोदी के नाम पर चुनाव जीत गए थे. 2014 के बाद से अक्सर यह देखने को मिलने लगा कि राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी पीएम मोदी की रैलियां होने लगी और राज्य के चुनावों में भी मोदी का असर दिखने लगा. कई राज्यों में भाजपा ने मोदी मैजिक के दम पर भी चुनाव जीत लिया या अच्छा खासा सीटें निकालने में सफल रही.

लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है कि पीएम मोदी से पहले किसी प्रधानमंत्री ने विधानसभा चुनावों में रैलियां न की हो…ऐसे तमाम प्रधानमंत्री रहें जिन्होंने अपनी पार्टी के लिए तमाम रैलियों को संबोधित किया. हालांकि, यहां तक तो सब ठीक था. लेकिन पीएम मोदी के चेहरे पर राज्यों का चुनाव जीतने का सिलसिला भला कब तक चल पाता. राज्य के मुद्दे अलग होते हैं, राज्य की चीजें अलग होती है, ऐसे में धीरे धीरे राज्यों में मोदी की धमक फीकी पड़ने लगी. 2018 में मोदी मैजिक के बावजूद भाजपा 3 बड़े राज्यों में अपनी सरकार गंवा बैठी.

ये राज्य थे राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश. उस समय तक तो छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भाजपा पिछले 15 सालों से सत्ता में थी और उससे ऊपर मोदी का जादू था. लेकिन गेम फ्लॉप रहा. हालांकि, लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा को शानदार जीत मिली और उसके बाद नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों समेत कई राज्यों में भाजपा का असर भी दिखा लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 से ठीक पहले कर्नाटक विधानसभा चुनाव ने पासा पलट दिया. पीएम मोदी ने यहां करीब ताबड़तोड़ 21 रैलियां की थी लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस बाजी मार ले गई. मोदी मैजिक को जनता ने नकार दिया.

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अब इसी साल राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और हर जगह भाजपा की स्थिति डांवाडोल ही नजर आती है. राजस्थान में भाजपा में अंदरुनी कलह जगजाहिर है और इससे भी बड़ी बात यह है कि पार्टी के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है. मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को जनता ने 2018 में ही नकार दिया था लेकिन जोड़ तोड़ कर सरकार बनी थी और अब एक बार फिर उन्हीं के चेहरे पर भाजपा उतरने वाली है. शिवराज सिंह करीब 20 साल से मध्य प्रदेश के सीएम हैं. राज्य की स्थिति में बदलाव हुआ है इसे नकारा नहीं जा सकता. लेकिन जिस तरह से बदलाव होना चाहिए, उतना नहीं हो पाया. ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि शिवराज सिंह चौहान को कोई मैजिक बचा नहीं पाएगा.

वहीं, छत्तीसगढ़ में भाजपा की जीत की संभावना 10 फीसदी से भी कम है. क्योंकि भूपेश पटेल अपने कुशल नेतृत्व के कारण जनता के दिलों में राज कर रहे हैं. इसी बीच अब भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए विपक्षी दल एकजुट होते दिख रहे हैं. लेकिन विपक्षी एकता (Vipakshi Ekta ki Baithak) सामने से जैसी दिखाई जा रही है, अंदर से उतनी ही खोखली है. कई राजनीतिक पार्टियों ने विपक्षी एकता से दूरी बना रखी है तो वहीं कई पार्टियां आपस में ही ‘कट-मर’ रही हैं. ऐसे में विपक्षी एकता का ढोल कितने दिनों तक चलेगा? कैसे विपक्षी पार्टियों की नैया पार लगेगी? किसके चेहरे पर विपक्ष एकजुट होगा या एकजुट हो पाएगा या नहीं? विपक्ष की ओर से कितने पीएम प्रत्याशी होंगे, आइए विस्तार से समझते हैं.

सब अपना- अपना ढोल पिट रहे हैं

हाल ही में बिहार में लोकसभा चुनाव 2024 (Lok Sabha Election 2024) को लेकर विपक्षी दलों की बैठक हुई थी. कई विपक्षी पार्टियां साथ आई थी. आम आदमी पार्टी और कांग्रेस पार्टी के नेता भी अगल बगल ही बैठे थे. मीडिया रिपोर्ट्स में ऐसी ख़बरें आईं कि विपक्षी पार्टियों के बैठक के दौरान आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच काफी तीखी नोक-झोंक देखने को मिली थी. वहीं, संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में आम आदमी पार्टी का कोई भी नेता शामिल नहीं था. केसीआर, जगन मोहन रेड्डी जैसे कई नेता इससे दूर रहें.

कुछ नेताओं (Real Story of Oppostion Unity) ने तो अपने प्रतिनिधि तक नहीं भेजें. इसके अलावा अगर पीएम मोदी को टक्कर देने वाले विपक्ष के चेहरे को देखा जाए तो दूर दूर तक कोई नहीं दिखता. ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि विपक्ष किसी एक नेता के चेहरे को सामने लाएगा और उसके चेहरे पर लोकसभा चुनाव लड़ा जाएगा लेकिन दूसरी ओर देखा जाए तो आज कल राहुल गांधी इमोशनल कार्ड खेलने में लगे हुए हैं. बाइक मैकेनिक वाला इंसिडेंट, ट्रक ड्राइवर वाला इंसिडेंट, खुद को मैच्योर दिखाने वाला इंसिटेंड सब इसी का हिस्सा है.

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केजरीवाल और KCR बंटाधार कर देंगे

वहीं, दूसरी ओर KCR बल प्रदर्शन करने में लगे हुए हैं. हाल ही में वह महाराष्ट्र (KCR in Maharashtra) में 600 गाड़ियों के साथ पहुंच गए. उन्हें एक मंदिर में दर्शन करना था. इस मामले को लेकर शरद पवार, केसीआर पर भड़क गए. अगर देखा जाए तो एनसीपी के नंबर-2 नेता अजीत पवार अपने चाचा शरद पवार पर भड़के हुए हैं. वहीं, ममता बनर्जी इन सब में काफी ज्यादा इन्वॉल्व नहीं दिख रही हैं. अरविंद केजरीवाल की राजनीति (Real Story of Oppostion Unity) को अभी तक मैं जितना समझ पाया हूं, उस हिसाब से वह कहीं भी अपनी बनी बनाई छवि से समझौता नहीं करेंगे. केजरीवाल की ब्रांडिंग को अगर आप ध्यान से देखेंगे तो यह समझ आएगा कि कहीं न कहीं वह ब्रांडिंग के मामले में पीएम मोदी के समान हैं. अगर विज्ञापनों में पीएम मोदी को कोई चुनौती दे सकता है तो वह केजरीवाल हैं. ऐसे में केजरीवाल अपने आप को कहीं भी पीछे होने नहीं देंगे.

नीतीश के नाम पर सस्पेंस

अगर हम नीतीश कुमार की बात करें तो उनकी राजनीति भी खत्म है! 2014 में एनडीए गठबंधन की ओर से उन्हें पीएम फेस नहीं बनाया गया था, इसलिए उन्होंने गठबंधन तोड़ दिया था. ऐसे में उनके पीएम बनने की महत्वाकांक्षा आज से नहीं बल्कि वर्षों से है. लेकिन 15 सालों से ज्यादा समय तक बिहार के सीएम रहने के बावजूद उन्होंने बिहार में कितना विकास किया है, यह शोध का विषय है. लोग ऐसा कहते हैं कि जब वह 2005 में दूसरी बार पूर्ण रूप से बिहार के सीएम बने थे तो अपने उस कार्यकाल में उन्होंने जमकर काम किया था और बिहार को संवारा था लेकिन उसके बाद वह सुप्त अवस्था में चले गए.

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में उनकी पार्टी का क्या हश्र हुआ यह किसी से छिपा नहीं है. बिहार की स्थिति जंगलराज के समय जैसी थी, अब नीतीश के शासन में उसी का प्रो-वर्जन नजर आता है. अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए नीतीश कुमार किसी भी हद तक जा सकते हैं, यह पिछले कुछ वर्षों में स्पष्ट हो गया है. ऐसे में उनके चेहरे पर भी बात बनेगी या नहीं, यह देखने वाली बात होगी.

विपक्ष के पास कई PM Face

अब अगर कुल मिलाकर देखा जाए तो विपक्ष के पीएम फेस में, राहुल गांधी, नीतीश कुमार, केसीआर, अरविंद केजरीवाल, जैसे कई नाम हैं और इनमें से पीछे हटने वाला कोई नहीं है. गांधी परिवार अपने युवराज के पैर पीछे नहीं खींचेगी. संभावना है कि केसीआर साथ नहीं आएंगे. अरविंद केजरीवाल समझौता नहीं करेंगे और नीतीश कुमार ‘महत्वाकांक्षा-महत्वाकांक्षा’ खेलेंगे. ऐसे में यह कहा जा सकता है कि विपक्षी एकजुटता किसी ट्यूब में हवा के समान है कि अगर किसी ने ट्यूब पर एक पिन मार दिया तो पूरी हवा (Real Story of Oppostion Unity in Hindi) निकल जाएगी. ये पिन मारने वाले NDA वाले भी हो सकते हैं या खुद विपक्षी एकता का ढोल पीटने वाली पार्टियां भी हो सकती हैं. यह सर्वविदित है कि भाजपा कमजोर हुई है, मोदी मैजिक फेल हुआ है लेकिन विपक्ष में अभी उतना दम नजर नहीं आता कि वह इन्हें मात दे सकें. बाकी जो है सो हईए है!

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