Mini punjab in Tokyo: पूरी दुनिया में एक ऐसा देश है, जो हर सालो सैकड़ो बड़े छोटे भूकंप झेलता है, लेकिन फिर भी वहां के लोगो का जीवन ऐसा है कि तमाम कछिनाईयों और खतरो के बाद भी वो सबसे सेफ देशों में कहलाता है, जहां के लोग इतने मेहनती होते है कि बार बार गिरने के बाद भी फिर से संभल जाते है, फिर से अपने घरों को अपनी जिंदगी को बनाने में लग जाते है, जिन्होंने एक नहीं बल्कि दो दो परमाणु बम झेल लिए, लेकिन आज दुनिया के ये सबसे विकसित देशों में से एक है। जिंदगी इतनी सादी है कि लोग ने अपनी लाइफ स्टाइल से जिंदगी बढ़ा ली, मजबूरी में बच्चे कम और बूढ़े ज्यादा हो गए है..लेकिन फिर भी ये अपनी रफ्तार बढ़ रहा है..जी हां, हम बात कर रहे है जापान की..जापान जो कि एक बौद्ध बहुल देश है, लेकिन फिर भी यहां भारतीय सिखों ने अपनी मेहनत और साहस के दम पर अपनी खास पहचान बनाई हुई है.. जापान के कोबे और टोक्यो, दो ऐसे क्षेत्र है जहां आज सिख धर्म का परचम लहरा रहा है। अपने इस वीडियो में हम टोक्यो में मौजूद एक मिनी पंजाब के बारे में जानेंगे, जो ये बताता है कि आखिर क्यों सिख धर्म भले ही एक छोटा सा लेकिन मजबूत समुदाय है।
टोक्यो में सिख धर्म की शुरुआत
जब जापान में सिख धर्म की बात होती है तो असल में ये 19वी सदी की शुरुआत मे ही सिख समुदाय के पहले शख्स पूरन सिंह जापान में पढ़ने के लिए गए थे, और वहीं रह कर बौद्ध भिक्षु बन गए, लेकिन जब कपूरथला के राजा जगतजीत सिंह ने 1903 और 1904 के बीच जापान का दौरा किया जो वो वहां की संस्कृति से बेहद प्रभावित हुए 1905 में ‘माई ट्रैवल इन चाइना, जापान एंड जावा नाम की किताब भी लिखी थी, यानि की सिखो के लिए जापान हमेशा से बेहतर जगह रही, वहीं जुलाई 1910 में, मुल्तान के केसर सिंह ने जापान की तरक्की के नाम से एक संस्करण लिखा था, जापान का आधुनिकीकरण और डेवलवमेंट ऐसा था कि लेखक ने तारीफ करते हुए भारत को जापान की तरह सोचने का सुझाव दिया था। हालांकि विश्व युद्ध के बाद सिख सैनिक जापान के योकोहामा में बस गए थे लेकिन जब 1923 के ग्रेट कांटो भूकंप आया तो बहुत त्रासदी हुई जिसके बाद सिख कोबे चले गए। धीरे धीरे सिखों ने जापान के कई इलाकों में बसना शुरू कर दिया और वो जापान के स्थानीय कार्यक्रमों में हिस्सा लेने गए।
जापान के साथ सिखो का रिश्ता और मजबूत
लेकिन दूसरे विश्व युद्द में भारत की सेना ने जापान के खिलाफ .युद्ध किया जिसके कारण कई सिख सैनिकों को जापान की सेना ने मार गिराया, हालांकि 1942 में आजाद हिंद फौज और सुभाष चंद्र बोस की जापान में सक्रियता के कारण सिख सैनिक आज़ाद हिंद सेना में सेवा करने लगे और ब्रिटिश उपनिवेशवादियों को भारत से बाहर निकालने के लिए जापानी साम्राज्य के साथ काम किया। जिस कारण जापान के साथ सिखो का रिश्ता और मजबूत हो गया। हालांकि कोबे के मुकाबले टोक्यो में सिख आबादी कम रही है। पहला गुरुद्वारा भी कोबे में ही 1952 में स्थापित किया गया था। हालांकि भारत की आजादी के बाद टोक्यो में सिखों की आबादी बढ़ी, लेकिन 1985 में, एक सिख ने नरीता हवाई अड्डे पर बमबारी कर दी, जिससे टोक्यो में सिखों के प्रति लोगों में अविश्वास पैदा होने लगा, और उनके साथ भेदभाव बढ़ने लगा।
नस्लीय भेदभाव के कारण सिखों ने टोक्यो को छोड़ा
नस्लीय भेदभाव के कारण सिखों को टोक्यो छोड़ना पड़ा। एक आकड़े बताते है कि 1990 के दशक के आखिर में टोक्यो में 20,000 से 30,000 सिख रहा करते थे, लेकिन भेदभाव और अविश्वास के कारण ज्यादातर सिखों ने टोक्यो को छोड़ दिया और मौजूदा समय में करीब 500 सिख टोक्यों में रहते है। हालांकि टोक्यो में रहने वाले सिख प्रवासी जापानियों के साथ घुलने मिलने के लिए अपनी मूल कल्चर को छोड़ रहे है। खासकर जो जापान में सालों से रह कर यहां की नागरिकता लेना चाहता है उन्हें अपनी मूल संस्कृति को छोड़ना पड़ेगा, लेकिन ऐसे बहुत से सिख है जो ऐसा नहीं करना चाहते है इसलिए वो अपनी परंपरा और संस्कृति के साथ ही रह रहे है।
जपजी साहिब का जापानी भाषा में अनुवाद
पंजाबी भाषा के प्रति लगाव और उससे जानने की ललक आप टॉमियो मिज़ोकामी जो कि एक जाने-माने जापानी शिक्षाविद हैं, उसने पूछ सकते है। उन्होंने गुरु नानक की जपजी साहिब रचना का जापानी भाषा में अनुवाद करने का प्रयास किया, और कई सिख किताबों का अनुवाद किया, ताकि जापान के लोगो को सिख धर्म की महानता का करीब से पता चल सकें। 2018 में, उन्हें पंजाबी और सिख संस्कृति को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया गया था, वहीं सिख पर्यावरण संगठन, इकोसिख ने गुरु नानक पवित्र वन को बसाने के लिए जापानी वनस्पतिशास्त्री अकीरा मियावाकी की पेड़ लगाने की विधि को अपनाया, जो भारत और जापान के मजबूत रिश्तों और आपसी समझ को दर्शाता है।
टोक्यो गुरु नानक दरबार
हालांकि कम होती संख्या के बाद भी 1999 में टोक्यो में सिख संगठन ने खालसा पंथ की 300वीं वर्षगांठ पर टोक्यो गुरु नानक दरबार’ नामक गुरुद्वारे की स्थापना की, जो कि एक कार्यालय भवन के तहखाने में बनवाया गया है। हालांकि ये गुरुद्वारा महीने में एक बाद ही खुलता है, लेकिन इस दौरान टौक्यो में रहने वाले सिख भारी संख्या में धार्मिक सेवाओ के लिए आते है। आपको जानकर हैरानी होगी कि साल 2021 में गुरु नानक दरबार टोक्यो गुरुद्वारे ने कोविड 19 महामारी से निपटने के लिए स्थानीय भारतीय निवासियों और जातीय जापानी दानदाताओं से 5.2 मिलियन येन का चंदा जमा किया था, ताकि प्रभावितों की मदद की जा सकें। मौजूदा समय में टोक्यो में रहने वाले सिखो को कई कठिनाईयो का सामना करना पड़ रहा है लेकिन फिर भी यहां रहने वाले सिखों ने अपनी एकता और साहस का परिचय देते हुए यहां के लोगो के दिलों में जगह बनाई है।




























