क्या सचमुच 1971 में भारत हासिल कर सकता था करतारपुर, जानें भारतीय सेना पाकिस्तान में कितनी दूर तक घुसी थी?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 26 May 2024, 12:00 AM | Updated: 26 May 2024, 12:00 AM

देश में चुनावी माहौल चल रहा है। ऐसे में पीएम मोदी भी बड़ी रैली कर विपक्ष पर निशाना साधने का एक भी मौका गंवाना नहीं चाहते। भारत में फिलहाल 6 चरणों में चुनाव हुए हैं। लोकसभा चुनाव के सातवें चरण के लिए मतदान 1 जून को होगा। वहीं, पंजाब में भी आखिरी चरण में चुनाव हैं। पंजाब में अपनी पहली रैली को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि अगर भारत ने 1971 के युद्ध में विजयी होने के बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने बातचीत की होती तो करतारपुर साहिब उसका हिस्सा होता। उन्होंने कहा कि 1971 के भारत-पाक युद्ध में 90 हजार से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया था। अगर वह (पीएम मोदी) उस समय सत्ता में होते तो पाकिस्तानी सैनिकों की रिहाई से पहले करतारपुर साहिब पर कब्जा कर लेते। आइए अब चलते हैं 1971 के उस दौर में जब पाकिस्तान भारत के सामने बेबस था और जानते हैं कि क्या भारत वाकई पाकिस्तान से करतारपुर लेने की स्थिति में था या नहीं?

और पढ़ें: नरेंद्र मोदी मेडिकल कॉलेज में रैगिंग के खिलाफ सख्त कार्रवाई, सात दिन तक न नहाने का आदेश देने वाले चार डॉक्टर सस्पेंड

1971 के युद्ध में जीत के बाद भी भारत का रवैया रहा नरम

पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों से तंग आकर 1970 के दशक की शुरुआत में पूर्वी पाकिस्तान से शरणार्थी भारत आने लगे। इस बीच अवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर रहमान की मुक्ति वाहिनी ने अलग बांग्लादेश की मांग को लेकर पाकिस्तानी सेना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। शरणार्थियों की बढ़ती संख्या के बाद भारत ने हस्तक्षेप किया और पाकिस्तान ने युद्ध की घोषणा कर दी। दिसंबर 1971 में 13 दिनों तक संघर्ष चला। भारतीय सेना ने 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों और रजाकारों को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया।

इन परिस्थितियों को लेकर प्रधान मंत्री मोदी कहते हैं कि उस युद्ध में हम जिस उन्नत स्थिति में थे, हम पाकिस्तान को जमीन वापस करने और इतने सारे सैनिकों को रिहा करने के बदले करतारपुर को अपने लिए ले सकते थे। क्योंकि भारतीय सेना ने पाकिस्तान के पंजाब राज्य की शकरगढ़ तहसील पर कब्ज़ा कर लिया था।

अब हम 1971 के युद्ध पर वापस आते हैं। 16 दिसंबर को जनरल नियाज़ी ने आत्मसमर्पण पत्र पर हस्ताक्षर किए और नए बांग्लादेश के जन्म के साथ ही पाकिस्तानी सैनिकों की रिहाई शुरू हो गई। लगभग 6 महीने बाद, 2 जुलाई 1972 को भारतीय प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान प्रधान मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। जीत के बाद भी, भारत ने नियंत्रण रेखा को सितंबर 1971 की स्थिति के रूप में मान्यता दी। यह भी निर्णय लिया गया कि दोनों देश बिना किसी मध्यस्थता के कश्मीर सहित द्विपक्षीय मुद्दों को आपस में सुलझा लेंगे।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने इस समझौते में ऐसी कोई शर्त नहीं रखी जिससे पाकिस्तान कमजोर हो। इस समझौते को विवादास्पद मुद्दों से दूर रखा गया। इस गलती से पीएम मोदी ने करतारपुर साहिब का जिक्र कर दो निशाने साधने की कोशिश की। पहला, उन्होंने सिख मतदाताओं को लुभाया, दूसरा, उन्होंने कांग्रेस को घेरने की कोशिश की।

और पढ़ें: Salman house firing case: लॉक-अप में खुदकुशी करने वाले आरोपी की ऑटोप्सी रिपोर्ट पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी

vickynedrick@gmail.com

vickynedrick@gmail.com https://nedricknews.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Editor's Picks

©2026- All Right Reserved. Manage By Marketing Sheds