Jaunpur News: गंगा स्नान के बहाने वृद्धाश्रम छोड़ आया बेटा, मां अब तन्हा… ये है प्रयागराज की मीरा देवी की कहानी

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Published: 07 Oct 2025, 12:00 AM | Updated: 07 Oct 2025, 12:00 AM

Jaunpur News: प्रयागराज की रहने वाली मीरा देवी की जिंदगी आज चार दीवारों में कैद है। उम्र के उस पड़ाव पर जहां इंसान अपने बच्चों के साथ वक्त बिताने का ख्वाब देखता है, मीरा देवी की झोली में आया है सिर्फ अकेलापन और इंतजार। उनका बेटा आज एक सफल दवा व्यापारी है, नाम है, शोहरत है… लेकिन मां के लिए दिल में कोई जगह नहीं बची।

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पति का साथ छूटा तो मां बनकर निभाया हर रिश्ता- Jaunpur News

मीरा देवी की ज़िंदगी का संघर्ष बहुत पहले शुरू हो गया था। जवानी में ही पति का साथ छूट गया था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। बेटे को पालने के लिए दूसरों के घरों में काम किया बर्तन मांजे, कपड़े धोए, और दिन-रात एक कर दिए। उनका एक ही सपना था कि बेटा बड़ा आदमी बने। बेटा बड़ा हुआ और खूब नाम कमाया, लेकिन उस कामयाबी की तस्वीर में मां कहीं पीछे छूट गईं।

‘चलो गंगा स्नान’ कहकर छोड़ा वृद्धाश्रम में

मीरा देवी आज भी उस दिन को नहीं भूल पातीं। बेटा अचानक एक दिन बोला “मां, चलो गंगा स्नान के लिए चलते हैं।” सालों बाद बेटे के साथ बाहर जाने का मौका मिला था। उन्होंने नई साड़ी पहनी, माथे पर बिंदी लगाई और बेटे के साथ गाड़ी में बैठ गईं। मगर गाड़ी गंगा घाट नहीं, सीधे एक वृद्धाश्रम के बाहर आकर रुकी।

बेटा बोला, “मां, आप यहीं बैठो, मैं दवा की दुकान से होकर आता हूं।” लेकिन वो कभी नहीं लौटा। घंटों बीत गए, और फिर वृद्धाश्रम की एक महिला ने आकर कहा “मां, आपका बेटा जा चुका है। अब यही आपका घर है।”

अब सिर्फ यादें हैं साथ… बेटा नहीं

मीरा देवी की आंखों में आज भी वो पल बसा है जब बेटा उनकी गोद में सोया करता था। वो रातें जब बेटे को खांसी आती थी, तो वो सारी रात जागकर सिर सहलाती थीं। लेकिन आज जब वो खुद बीमार होती हैं, तो हाल पूछने वाला कोई नहीं है। वृद्धाश्रम की दीवारें उनकी नई दुनिया हैं, और पुराने दिनों की यादें उनका सहारा।

सिर्फ मीरा देवी की नहीं, समाज की भी कहानी है ये

मीरा देवी की कहानी कोई अकेली मिसाल नहीं है। ये उन हजारों माओं की कहानी है जिन्हें उम्र के इस मोड़ पर उनके अपने छोड़ जाते हैं। समाज में माता-पिता को भगवान का दर्जा तो दिया जाता है, लेकिन जब उन्हें साथ की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब वही ‘भगवान’ अकेले रह जाते हैं।

अब भी आंखों में एक उम्मीद है

मीरा देवी की आंखें आज भी दरवाजे की तरफ उठती हैं… शायद बेटा लौट आए और कहे—”मां, चलो घर चलें।” लेकिन अब वो जान चुकी हैं कि घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनता, घर वो होता है जहां अपने हों। और आज, वो अपने कहीं खो गए हैं।

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