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छूआछूत और शारीरिक उत्पीड़न से निकल कर बनाई अपनी पहचान, बन गईं देश की पहली दलित ‘बिजनेस वूमन’

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 05 Sep 2023, 12:00 AM | Updated: 05 Sep 2023, 12:00 AM

Who is Kalpana Saroj full details in Hindi – देश की पहली महिला उद्यमी के साथ पहली दलित महिला जोड़कर, मैंने इसीलिए लिखा क्योंकि जाति और पितृसत्ता के दोहरे दंश को दलित महिलाएं झेलती हैं. हमारे देश के किसी बच्चे से लेकर बड़े से पूछें कि किसी उद्यमी का नाम बताएं, तो वे आपको पुरुषों के नाम की पूरी लिस्ट गिनवा देंगे. लेकिन किसी एक भी उद्यमी महिला का नाम नहीं आएगा, वो भी दलित महिल का तो बिलकुल भी नहीं.

हम आपको बता दे कि वर्ष 2005 में हार्वर्ड बिजनेस स्कूल द्वारा किए गए सर्वेक्षण में सामने आया, कि भारत में दलितों द्वारा चलाए जाने वाले उद्योग सिर्फ 9.6% ही हैं. इंस्टिट्यूट ऑफ दलित स्टडीज के अनुसार 96 फीसद इसमें से लघु उद्योग हैं. इन आंकड़ो में महिलाएं तो शायद ही कहीं पाई जाती है. ऐसा इसीलिए क्योंकि इतिहास से ही महिलाओं को तो समाज में अपना इंसान होने तक के अधिकार के लिए लड़ना पड़ रहा है. और अगर वह महिला दलित हो तो सोने पर सुहागा वाली बात हो जाती है.

आज हम बात करेंगे एक दलित महिला उद्यमी के बारे में जो हमारे देश की पहली दलित महिला उद्यमी है. जिनका नाम पद्मश्री कल्पना सरोज है. साल 2013 में कल्पना सरोज जी को ट्रेड एंड इंडस्ट्री फील्ड में पद्मश्री पुरस्कार से नवाज़ा गया था. वर्तमान में यह कमानी ट्यूब्स कंपनी, मुंबई, महाराष्ट्र की सीईओ है. टेड एक्स स्पाकर और यह एक फाउंडेशन भी चलती है जो महिलाओं के लिए काम करता है. वर्तमान में इनकी कंपनी की सालाना आय 750 करोड़ है.

और पढ़ें : कौन हैं वे दलित महिलाएं? जिन्होंने समाज की बंदिशों को तोड़ बजाय ‘बैंड’

दलित महिला उद्यमी कल्पना सरोज की कहानी

देश की पहली दलित महिला उद्यमी कल्पना सरोज का जन्म साल 1961 में रोपरखेडा महाराष्ट्र के एक गरीब दलित परिवार में हुआ था. उनके पिता महादेव अपने ही गांव में पुलिस कांस्टेबल थे. इनके पिता इतने ज्यादा पढ़े लिखे तो नहीं था, पर अपनी बेटी को पढ़ना चाहते थे. इसीलिए उन्हें सरोज को गावं के सरकारी स्कूल में भेजना शुरू कर दिया. लेकिन स्कूल में सरोज को जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा.

बाकि बच्चो और शिक्षको को यह पसंद नही था कि उनके बचे के साथ दलित लडकी पढती है. जिसके चलते 7वीं कक्षा में सरोज को स्कूल छोड़ना पड़ा. सरोज आगे पढ़ना चाहती थी, लेकिन उस समय दलित समुदाय में लडकियों की शादी जल्दी कर दी जाती थी. इसीलिए 12 साल की उम्र में सरोज की भी शादी कर दी गयी थी. सरोज को 12 साल की उम्र में उस भट्टी में झोंक दिया जिसमे आज भी बहुत सारी लडकियां घरेलू हिंसा को शारीरिक और मानसिक तौर पर झेल रही है.

लडकियों को शुरू ही सिखाया जाता है कि तुम्हारी “मायके से डोली, ससुराल से अर्थी ही उठनी चाहिए वरना घरवालों की नाक कट जाती है, इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाती है”.

कल्पना सरोज ने ऐसे पाया मुकाम – Who is Kalpana Saroj

कल्पना सरोज (Kalpana Saroj Life story) की शादी के कुछ समय बाद उनके पिता अपनी बेटी से मिलने उसे ससुराल आते है. वहां जाकर उन्हें पता चलता है कि उनकी बेटी के साथ शारीरिक उत्पीडन हुआ है. वह समाज की सोचे अपनी बेटी को वापिस अपने घर ले गए और कभी वापिस नी भेजा. घर आकर कल्पना लोगों के ताने सहन नहीं कर पाई इसीलिए 15 साल की उम्र में वह आपने चाचा के मुंबई आ गयी और गारमेंट फैक्ट्री में बतौर असिस्टेंट टेलर काम करने लगीं. समय के साथ टेलरिंग में उनका हाथ जम गया तो वह सीनियर टेलर बनीं. एक दिन रेडियो के जरिये उन्हें दलितों के कामकाजी लोन के बारे में पता चला, जिसके भाद वह लोन लेकर अपने घर कुछ सिलाई मशीन लाती है. जैसे जैस काम बढने लगा तो मशीनी के साथ उसने फर्नीचर का काम शुरू कर दिया.

उस दलित महिला ने समाज की बंदिशों को तोड़ कर दूसरी शादी साल 1980 में उनकी शादी समीर सरोज से हो जाती है, जिनका स्टील फर्नीचर का बिज़नेस था. लेकिन कुछ सालों बाद ही उनके जीवन साथी की मौत हो गयी.

कल्पना सरोज (Kalpana Saroj turnover) के जीवन जब बदला एक व्यक्ति सरोज के पास आकर कहता है कि वह उसकी जमीन खरीद ले क्यों कि उसे पैसों की जरूरत है. उस जमीन पर कुछ कानूनी कार्यवाही चल रही थी, जो सरोज ने जल्दी ही जीत लिए, उस समय तक उस जमीन की क़ीमत 50 लाख हो चुकी थी. यहीं से कल्पना रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन के बिज़नेस में कदम रखती हैं. उस समय दलितों के पास जमीन नहीं होती थी, ऐसे में दलित महिला का रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन के बिज़नेस हों काफी बड़ी बात थी. जो समाज को मंजूर नहीं थी, जिसके चलते सरोज जी को मरवाने की भी कोशिश की गयी थी.

देश की दलित महिला ने न सिर्फ उद्योग किया बल्कि उसे उचे मुकाम तक भी पहुचाया. आज उनकी कंपनियों का सालाना टर्नओवर 750 करोड़ है. जो जातिगत और पितृसत्ता समाज के मुहं पर तमाचा है.

और पढ़ें : पीके रोजी: एक ऐसी दलित अभिनेत्री, जिसे फिल्मों में काम करने के लिए अपनी पहचानी छिपानी पड़ी 

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