Trending

गुरुद्वारा श्री लकीर साहिब: जब कटे हुए सिर के साथ गुरुद्वारे की परिक्रमा करते हुए इस सिख योद्धा ने त्याग दिया था शरीर

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 05 Sep 2023, 12:00 AM | Updated: 05 Sep 2023, 12:00 AM

Gurudwara Sri Lakeer Sahib History in Hindi – गुरु नानक देव जी ने भारत पर बाबर के आक्रमण और उसमें हुए भीषण रक्तपात को अपनी आंखों से देखा था…अपनी पुस्तक बाबर वाणी में उन्होंने इसका पूरा जिक्र किया है. सिख धर्म के जितने भी गुरु हुए, सभी के सभी मुगलों के समकालीन हुए और कई गुरु, मुगल शासकों की क्रूरता के शिकार हुए. एक समय ऐसा भी आया कि सिखों ने मुगल शासकों के विरुद्ध हथियार उठाए और अपने धर्म की रक्षा के लिए रणभूमि में कूद पड़े. सिखों के बढ़ते प्रभाव से हर आक्रांता को परेशानी थी. तभी तो मुगल वंश के पतन के बाद भी आक्रांताओं ने सिखों के धार्मिक स्थलों को निशाना बनाना नहीं छोड़ा था. इस लेख में हम आपको अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध उठ खड़े हुए सिखों की कहानी और उसके परिणामस्वरुप बने गुरुद्वारा श्री लकीर साहिब की कहानी के बारे में बताएंगे.

और पढ़ें: जानिए कैसे की जाती है SGPC के प्रमुख और अकाल तख्त के जत्थेदार की नियुक्ति ?

अब्दाली vs बाबा दीप सिंह की कहानी

दरअसल, पंजाब के सिखों की आध्यात्मिक शक्ति को खत्म करने के इरादे से अहमद शाह अब्दाली ने जहान खान को श्री हरिमंदिर साहिब को नष्ट करने के लिए भेजा. अपने आका के आदेश का पालन करते हुए जहान खान ने 1757 में एक बड़ी सेना और अत्याधुनिक हथियारों के साथ अमृतसर पर हमला बोल दिया. इन आक्रांताओं ने पहले ही वार में राम रौनी का सिख किला गिरा दिया, श्री हरिमंदिर सिंह के आस पास की कई दीवारों को गिरा दिया गया. हजारों की संख्या में सिख मारे गए. श्री हरिमंदिर साहिब गुरुद्वारे के सरोवर को सिखों के शव, मृत जानवरों के शव और मलबे से भर दिया गया. उस समय इस गुरुद्वारे को सभी सिखों के लिए बंद कर दिया गया.

इससे पहले कभी भी सिखों के धार्मिक स्थल का इतना अपमान नहीं हुआ था. जब हालात बिगड़ने लगे, तब बाबा दीप सिंह इस लड़ाई में कूद पड़े. सिखों के लिए जीवन और मरण का सवाल था. 1757 में आक्रांताओं से लड़ाई के लिए बाबा दीप सिंह ने एक रेखा खिंची और केवल उन्हीं लोगों से उस रेखा को पार करने को कहा जो सिखी और श्री हरिमंदिर साहिब जी के अपमान को रोकने के लिए लड़ने और मरने को तैयार थे. बाबा दीप सिंह के नेतृत्व में काफी ज्यादा संख्या में सिखों ने इस युद्ध में भाग लिया और वीरगति को प्राप्त हुए.

इस युद्ध में बाबा दीप सिंह ने भी सिख धर्म की रक्षा के लिए अपना शीश कुर्बान कर दिया. रणक्षेत्र में उनका शीश उनके धड़ से अलग हो गया और जब उन्हें सिख धर्म की रक्षा की याद आई तो उनका शरीर अपने आप खड़ा हो गया. कहा जाता है कि उन्होंने खुद अपना सिर उठाकर श्री हरिमंदिर साहिब की परिक्रमा की और वहीं पर अपने प्राण त्याग दिए.

खालिस्तान की राजधानी बनाने की उठी थी मांग

बाबा दीप सिंह ने जहां लकीर खींची थी उस स्थान पर सिखों ने पहले एक कुएं का निर्माण करवाया और उसके कुछ ही समय बाद उस जगह पर श्री लकीर साहिब गुरुद्वारा का निर्माण हुआ. आपको बता दें कि 1980 और 90 के दशक की शुरुआत में खालिस्तानी लकीर साहिब को, खालिस्तान की राजधानी बनाने की बात कर रहे थे. लेकिन खालिस्तानियों के इस मंसूबे पर भी पानी फिर गया था. ध्यान देने वाली बात है कि श्री लकीर साहिब गुरुद्वारा जिस शहर में है, उसका गठन 2006 में हुआ था. श्री अर्जुनदेव साहिब जी की शहीदी दिवस के अवसर पर पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इसे पंजाब का 19वां जिला बनाया था.

और पढ़ें: जानिए राजा मेदिनी ने क्यों मांगी थी गुरु गोविंद सिंह जी से उनकी तलवार

vickynedrick@gmail.com

vickynedrick@gmail.com https://nedricknews.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News

Trending News

Editor's Picks

Latest News

©2025- All Right Reserved. Designed and Developed by  Marketing Sheds