The Great Battle of Jamrud: जब सिखों की बहादुरी की बात होती है तो सारागढ़ी के युद्द के अलावा एक और युद्ध है, जिसमें सिख सैनिकों ने न केवल हजारो की संख्या में अफगान सैनिकों का सामना किया बल्कि उन्होंने अपनी बहादुरी की मिसाल देते हुए अफगानी शासक को झुकने के लिए मजबूर कर दिया। ये युद्ध है जमरूद का…जहां 800 सैनिकों ने न केवल जमरूद के किले में 8 दिनो तक जिंदा रहने की जंग जीती बल्कि अफगानो को ये भी समझा दिया कि क्यों सिक्खी में कहा जाता है कि उनका एक सैनिक सवा लाख के बराबर है। हालांकि जमरूद के इस युद्द के कारण सिखों ने अपना एक बहादुर योद्ध खो दिया था। जी हां, हम बात कर रहे है शेर एक पंजाब महाराजा रणजीत सिंह जी की सेना में छोटी उम्र में सेनापति चुने जाने वाले सरदार हरि सिंह नलवा की।
जमरूद के किले की कहानी
इतिहासकारों की माने तो भारत में 636 ईसवी में पहला इस्लामिक हमला हुआ था, जो कि पानी के रास्ते से पूणे में किया गया था, लेकिन ये हमला भारतीय लड़ाको ने असफल कर दिया था, लेकिन 712 में फिर से अरब का आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम ने सिँध के रास्ते से हमला किया था, और वो भारत में घुसने में सफल रहा था। लेकिन 12 सदी में इराक के शासक हाकिम हल हज्जाज के हमले के बाद भारत में इस्लामिक ताकतें बढ़ने लगी। मुगलो के भारत में शासन करने से पहले भारत पर कई आक्रमणकारियों ने हमला किया, वो लूटपाट करते थे और चले जाते थे, और ये सिलसिला काफी लंबे समय तक चलता रहा था लेकिन जब पंजाब की गद्दी पर महाराजा रणजीत सिंह बैठे तो उन्होंने सबसे पहले देश की सीमाओं को मजबूत करने और सबके साथ युद्ध से या फिर मैत्रीपूर्ण तरीके से संधि करना शुरु कर दिया।
हरि सिंह नलवा का शौर्य
वो अपने राज्य के विस्तार के लिए जंग लड़ते थे, और उनकी ही सेना के सेनापति थे सरदार हरि सिंह नलवा। भारत की सीमा पर सबसे ज्यादा खतरा पैदा करते थे अफगान… जिनके आने का सबसे बड़ा रास्ता था खैबर दर्रा। आज ये क्षेत्र बाब-ए-ख़ैबर के पास मौजूद है, जो कि पाकिस्तान के ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा के संघीय प्रशासित कबायली क्षेत्र में पड़ता है, लेकिन 18वी सदी में ये अफगानिस्तान का हिस्सा था और अफगानियों का इस पर शासन था, ये वो दर्रा है, जिसके रास्ते थे अक्सर अफगानी अक्रमणकारी भारत में आकर हमला करते थे।
खैबर दर्रे पर सिखों की दहाड़
लेकिन इन्हें रोकने के लिए महाराजा रणजीत सिंह ने अपने सबसे बहादुर सिपाही हरि सिंह नलवा को खैबर दर्रे पर भेजा और हरि सिंह नलवा ने अफगानों को खदेड़ते हुए इस इलाके पर कब्जा कर लिया, और फिर उन्होंने अफगानों को रोकने और सिखों के वर्चस्व को कायम करने के लिए 18 दिसंबर 1836 के दिन जमरूद के किले का निर्माण शुरु किया। इस किले के निर्माण के कारण अफगानों के लिए भारत पर हमला करने की साजिश नाकाम होती नजर आने लगी तो अफगानों ने किले पर ही कब्जा करने के लिए हमला कर दिया।
जमरूद के किले के लिए लडाई
दरअसल 30 अप्रैल 1837 को वज़ीर अकबर खान ने 7,000 घुड़सवारों, 2,000 बंदूकधारी सैनिकों, 9,000 गुरिल्ला लड़ाकों और 20,000 खैबरियों के साथ साथ 18 तोपो के साथ जमरूद के किले पर हमला कर दिया। उस दौरान सरदार हरि सिंह नलवा लाहौर में थे, क्योंकि 1837 में महाराजा रणजीत सिंह के पोते कंवर नौ निहाल सिंह की शादी के लिए पेशावर सहित पूरे सिख साम्राज्य से उनके सभी बेहतरीन जनरलों और सैनिकों को वापस लाहौर बुलाया गया था और जमरूद के किले में केवल 800 सिख सैनिक थे। अफगानो का अचानक हमला था, ऐसे में सिख सैनिकों के लिए मदद की मांग करने के लिए संदेश भेजना भी आसान नहीं था।
वीर बहादुर महिला शरण कौर
लेकिन फिर भी सिख सैनिकों ने हार नहीं मानी, उन्होंने पूरे 7 दिनो तक कोई हलचल नहीं की, ताकि अफगानों को ये पता न चले कि किले के अंदर कितने सैनिक है और उन लोगो का ध्यान किले की दीवार तोड़ने में लगा रहा, लेकिन इसी बीच सिखों की सेना में खानसामे का काम करने वाली वीर बहादुर महिला शरण कौर ने ये जिम्मेदारी अपने कंधे पर ली और रात के अँधेरे में चोरी छिपे निकल गई, और लगातार चलती रही, सुबह तक वो लाहौर पहुंची और हरि सिंह नलवा को इसकी जानकारी मिली।
फगानी सेना किले के बाहर
हरि सिंह नलवा तुरंत वहां से सेना लेकर निकले, जबकि व खुद बीमार थे, लेकिन उन्होंने तोप से उद्घोष करवा दिया कि वो अपनी सेना के लिए आ रहे है। करीब 2 दिनो तक उनकी सेना आगे बढ़ती रही और जमरूद पहुंची..तब तक सिख सैना ने मोर्चा संभाले रखा। हरि सिंह नलवा के हमले से अफगानव सेना तीतर बीतर हो गई अकबर खान की सेना को शम्स अल-दीन खान ने बचाया, जिसने सिख सेना पर हमला किया, लेकिन ये सिखों की जीत नहीं थी, कुछ समय के बाद ही अकबर खान ने फिर से सिखों पर हमला कर दिया था, और इस बार सिखों को फिर से जमरूद किले तक पीछे हटना पड़ा।
भीषण युद्ध हुआ और हरि सिंह नलवा को दो गोलियां लगी.. घायल अवस्था में उन्हें जमरूद किले में ले जाया गया, लेकिन अफगानी सेना किले के बाहर ही रही, किले के अंदर जाने की हिम्मत नहीं कर पाई.. हरि सिंह नलवा के पेट और कंधे में गोली लगी थी, लेकिन मरने से पहले उन्होंने लाहौर से मदद के लिए संदेश भेज दिया था, इतना ही नहीं उन्होंने अपनी मौत के बाद उनके शरीर को किले की उंचाई पर खड़ा करने का आदेश दिया जाति अफगानों को ये गलतफहमी रहे कि नलवा जीवित है, और मदद आने तक सिखों को कोई प्रतिक्रिया न करने का आदेश दिया।
सिख लड़ाको ने भी ऐसा ही किया और अफगानों ने हरि सिंह नलवा जीवित है ये सोच कर किले में प्रवेश नहीं किया, और मरने के बाद भी नलवा ने अपने एक बहादुर लड़ाके होने का सबूत दिया। लाहौर से मदद आई और अफगानी सेना पीछे हट गई और वापिस जलालबाद लौट गई। जमरूद की लड़ाई का कोई निर्णय नहीं निकला, लेकिन हरि सिंह नलवा की बहादुरी और उनके नेतत्व की क्षमता ने बताया कि योद्ध केवल जीवित रहते हुए ही नहीं मरने के बाद भी दुश्मनों को घुठने टेकने पर मजबूर कर दिया था। ऐसे थे हरि सिंह नलवा.. और ऐसे थे बहादुर सिख सैनिक जिन्होंने जमरूद में किला बना कर बाहरी हमलावरो से भारत की रक्षा की।





























