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Ajit Pawar political journey: चाचा की उंगली पकड़कर ली थी सियासत में एंट्री, फिर खुद बने पावर सेंटर! ऐसा रहा अजित पवार का सियासी सफर

Nandani | Nedrick News

Published: 28 Jan 2026, 09:19 AM | Updated: 28 Jan 2026, 09:19 AM

Ajit Pawar political journey: महाराष्ट्र की सत्ता राजनीति में आज एक ऐसा नाम अचानक इतिहास बन गया, जिसने पिछले चार दशकों तक सरकारें बनते-बिगड़ते देखीं और खुद कई बार सत्ता के केंद्र में रहा। हम बात कर रहे हैं राज्य के उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के वरिष्ठ नेता अजित पवार की। बारामती में एक विमान हादसे में उनका निधन हो गया। बताया जा रहा है कि वह जिला परिषद चुनाव के प्रचार के लिए बारामती पहुंच रहे थे। इसी दौरान लैंडिंग के वक्त उनका विमान क्रैश हो गया। हादसा बुधवार सुबह करीब 8.45 बजे हुआ। विमान में कुल पांच लोग सवार थे। यह हादसा इतना भयानक था कि प्लेन में सवार सभी लोगों की मौत हो गई।

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अगर अजित पवार के राजनीतिक सफर की बात करें तो, चाचा शरद पवार की राजनीतिक विरासत से निकलकर अपनी ताकत और रणनीति के दम पर अलग पहचान बनाने वाले अजित पवार का सफर सिर्फ पदों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह सत्ता संतुलन, राजनीतिक दबाव और अंदरूनी बगावतों की कहानी भी था।

चार दशक से ज्यादा लंबा राजनीतिक सफर (Ajit Pawar political journey)

अजित पवार ने राजनीति का ककहरा अपने चाचा और दिग्गज नेता शरद पवार के साथ सीखा। बीते चार दशकों से भी ज्यादा समय तक वह महाराष्ट्र की राजनीति का एक मजबूत चेहरा बने रहे। वह राज्य के 8वें उपमुख्यमंत्री थे और अलग-अलग सरकारों में कई अहम विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके थे।

हालांकि राजनीतिक परिस्थितियों के चलते साल 2022 में वह अपने चाचा शरद पवार से अलग हो गए और NCP दो हिस्सों में बंट गई, लेकिन निजी रिश्तों में कभी दूरी नहीं आई। राजनीति से इतर वह लगातार अपने चाचा के संपर्क में रहे और मिलते-जुलते रहे। हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में भी चाचा-भतीजे पुणे नगर निगम में साथ आए और मिलकर चुनाव लड़ा।

पहले लोकसभा, फिर विधानसभा में मजबूत एंट्री

अजित पवार को पहली बड़ी चुनावी सफलता साल 1991 में मिली, जब उन्होंने बारामती लोकसभा सीट से जीत हासिल की। हालांकि कुछ समय बाद ही उन्होंने यह सीट अपने चाचा शरद पवार के लिए छोड़ दी। उपचुनाव में शरद पवार की जीत हुई और वह पीवी नरसिम्हा राव सरकार में रक्षा मंत्री बने।

इसी साल अजित पवार ने अपने परिवार के राजनीतिक गढ़ बारामती विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और विधायक बने। इसके बाद बारामती उनके लिए सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि राजनीतिक पहचान बन गई। उन्होंने इस सीट से लगातार आठ बार जीत दर्ज की: 1991, 1995, 1999, 2004, 2009, 2014, 2019 और 2024 में।

1991 में मंत्री पद से शुरुआत

विधानसभा पहुंचते ही अजित पवार को जिम्मेदारियां मिलने लगीं। 1991 से 1992 तक वह तत्कालीन मुख्यमंत्री सुधाकरराव नाइक की सरकार में कृषि और बिजली राज्य मंत्री बने। 1992 में जब शरद पवार मुख्यमंत्री बने, तब अजित पवार को मृदा संरक्षण, बिजली और योजना जैसे अहम विभाग सौंपे गए।

इसके बाद 1999 में कांग्रेस-NCP गठबंधन सरकार में उन्हें सिंचाई मंत्री बनाया गया। महाराष्ट्र जैसे राज्य में सिंचाई विभाग को हमेशा से ताकतवर मंत्रालय माना जाता रहा है और इसी दौरान अजित पवार एक मजबूत प्रशासक के तौर पर उभरे।

अलग-अलग सरकारों में अहम भूमिका

2003 में सुशील कुमार शिंदे की कैबिनेट में अजित पवार को ग्रामीण विकास विभाग की जिम्मेदारी मिली। 2004 के विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस-NCP गठबंधन की वापसी हुई और वह विलासराव देशमुख, फिर अशोक चव्हाण की सरकार में जल संसाधन मंत्री बने।

इन विभागों में रहते हुए उन्होंने ग्रामीण इलाकों, सिंचाई परियोजनाओं और विकास से जुड़े फैसलों में अहम भूमिका निभाई। यही वजह रही कि वह सिर्फ पार्टी के भीतर ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक हलकों में भी प्रभावशाली माने जाने लगे।

छह बार उपमुख्यमंत्री, सत्ता के केंद्र में

अजित पवार पहली बार 2010 में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बने। वह राज्य के 8वें उपमुख्यमंत्री थे और कुल छह बार इस पद तक पहुंचे। करीब आठ साल तक उन्होंने डिप्टी सीएम की जिम्मेदारी निभाई।

पृथ्वीराज चव्हाण और देवेंद्र फडणवीस दोनों के कार्यकाल में वह दो-दो बार उपमुख्यमंत्री रहे। इसके अलावा उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे की सरकार में भी उन्होंने यह पद संभाला। अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों में उनकी मौजूदगी यह दिखाती है कि सत्ता संतुलन में उनकी भूमिका कितनी अहम रही।

बारामती में अटूट पकड़

लगातार चुनाव लड़ने के बावजूद अजित पवार की लोकप्रियता बारामती में कभी कमजोर नहीं पड़ी। 2019 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने करीब 1.65 लाख वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की। 2024 के चुनाव में भी वह एक लाख से ज्यादा वोटों (100,899) के अंतर से विजयी रहे। यह आंकड़े उनकी जमीनी पकड़ और संगठन पर मजबूत पकड़ को दिखाते हैं।

चाचा के खिलाफ बगावत, लेकिन रिश्ते कायम

अजित पवार का करियर सिर्फ सत्ता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विवादों और टकरावों से भी भरा रहा। उन्हें अक्सर लगता रहा कि मुख्यमंत्री जैसे पद से उन्हें जानबूझकर दूर रखा गया। उनका मानना था कि 2004 के बाद से शरद पवार ने उन्हें बार-बार मौके नहीं दिए।

यही नाराजगी 2022 में खुलकर सामने आई, जब उन्होंने अपने चाचा शरद पवार के खिलाफ कदम उठाया और NCP दो हिस्सों में बंट गई। शिवसेना में टूट के बाद बनी एकनाथ शिंदे सरकार में अजित पवार उपमुख्यमंत्री बने। हालांकि सियासी मतभेदों के बावजूद चाचा-भतीजे के निजी रिश्ते अंत तक बने रहे। वह नियमित रूप से शरद पवार से मिलते रहे और उनका आशीर्वाद भी लेते रहे।

महाराष्ट्र की राजनीति में स्थायी प्रभाव

अजित पवार का राजनीतिक करियर महत्वाकांक्षा, सत्ता संघर्ष और प्रशासनिक पकड़ का मिश्रण रहा। उन्होंने समर्थकों के बीच ‘दादा’ के नाम से पहचान बनाई और विरोधियों के लिए हमेशा एक मजबूत चुनौती बने रहे।

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Nandani

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