77वें कान्स फिल्म फेस्टिवल में पहुंची इस फिल्म को नहीं मिला था बजट, 5 लाख किसानों ने दिए थे 2-2 रुपये

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 23 May 2024, 12:00 AM | Updated: 23 May 2024, 12:00 AM

बॉलीवुड में ऐसी कई फिल्में हैं जिनका बजट 1000 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है। कुछ फिल्में ऐसी भी रही हैं जिनका बजट 50 करोड़ के अंदर ही रहा। फिर भी वह फिल्म अपने बजट से ज्यादा कमाई करती है और उसके आगे बड़े बजट की फिल्म भी फ्लॉप हो जाती है। खैर, बॉलीवुड में हिट और फ्लॉप का सिलसिला चलता रहता है। अब कई एक्टर्स भी ऐसे हैं जो खुद अपनी फिल्मों में पैसे लगाते हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था कि कलाकार, लेखक, डायरेक्टर तो फिल्म बनाने के लिए मिल जाते थे, लेकिन प्रोड्यूसर अपना पैसा फिल्म में लगाने से कतराते थे। ऐसे में वह फिल्म क्राउड फंडिंग की मदद से बनाई जाती थी। यह बात सुनने में आपको अजीब लग सकती है लेकिन यह सच है। पहले के समय में ऐसी कई फिल्में आई हैं जिन्हें क्राउड फंडिंग मिली। इनमें से एक ऐसी फिल्म है जिसे हाल ही में कान्स फिल्म फेस्टिवल के 77वें संस्करण में स्क्रीनिंग का मौका मिला। यह फिल्म हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर मानी जाती है। जो 17 मई को कान्स फिल्म फेस्टिवल के दौरान सैले बुनुएल में दिखाई गयी। यह फिल्म श्याम बेनेगल की यादगार रचना ‘मंथन’ है जिसमें स्मिता पाटिल का शानदार अभिनय देखने को मिला था। यह एकमात्र भारतीय फिल्म है जिसे इस साल कान्स के क्लासिक सेक्शन में दिखाए जाने के लिए चुना गया है।

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फिल्म के लिए की गई क्राउड फंडिंग

नफा-नुकसान किसी को मालामाल तो किसी को सड़क पर ले आता है। पहले के दौर में कई निर्माता बड़े बजट और बड़े कलाकारों वाली फिल्मों में ही पैसा लगाते थे। इसी वजह से निर्माता 1976 में रिलीज हुई ‘मंथन’ फिल्म को फंड नहीं करना चाहते थे। बाद में क्राउड फंडिंग के जरिए ये फिल्म बनाई गई। जब यह फिल्म बनकर तैयार हुई तो यह एक कल्ट क्लासिक बन गई। इस फिल्म ने भारत में इतिहास रच दिया और क्राउड फंडिंग से बनी पहली फिल्म बन गई।

फिल्म की कास्ट

इस फिल्म में दिवंगत अभिनेत्री स्मिता पाटिल लीड रोल में थीं। उनके साथ गिरीश कर्नाड, कुलभूषण खरबंदा, नसीरुद्दीन शाह, मोहन अगाशे, अनंत नाग और अमरीश पुरी भी मुख्य रोल में थे। इसे श्याम बेनेगल ने डायरेक्ट किया। हर किरदार सटीक बैठा था, लेकिन इस फिल्म को बनाने के लिए श्याम बेनेगल कई पापड़ बेले थे।

इस तरह बन पाई फिल्म

उस समय नसीरुद्दीन शाह नये थे। उन्होंने अभी कला सिनेमा में अपने पैर जमाना शुरू ही किया था। जबकि गिरीश कर्नाड शीर्ष कला अभिनेता थे। फिल्म में अमरीश पुरी का दमदार नेगेटिव रोल था। 134 मिनट की इस फिल्म में डेयरी कूपरेटिव मूवमेंट को दिखाया गया था। इस आंदोलन ने भारत को दूध की कमी वाले देश से दुनिया के शीर्ष दूध उत्पादक देश में बदल दिया।

फिल्म की कहानी वर्गीस कुरियन से ली गई है। वर्गीस कुरियन को भारत में दूध उत्पादन में क्रांति लाने के लिए जाना जाता है। फिल्म में गिरीश ने ‘मिल्कमैन ऑफ इंडिया’ कहे जाने वाले वर्गीज कुरियन का किरदार निभाया था। स्मिता पाटिल मुख्य रूप से गांव की महिलाओं को शो करती नजर आईं।

‘मंथन’ ग्रामीण परिवेश की आर्थिक-सामाजिक चुनौतियों को दर्शाता है। फिल्म के संवाद कैफ़ी आज़मी ने लिखे थे। इसकी कहानी वर्गीस कुरिया और श्याम बेनेगल ने मिलकर लिखी थी। वहीं इसकी सिनेमेटोग्राफी की जिम्मेदारी गोविंद निहलानी के पास थी।

इस फिल्म को बनाने के लिए गुजरात के दुग्ध उत्पादन समूह के 5 लाख किसानों ने 2-2 रुपये दिए थे, जिसके बाद ही यह फिल्म बन पाई। इस फिल्म की रिलीज के बाद ये किसान ट्रकों में भरकर फिल्म देखने आए थे।

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