4th Guru of Sikh: सिखों के चौथे गुरु का नाम जेठा जी से कैसे पड़ा गुरु रामदास जी? जानिए इसके पीछे की रोचक कहानी…

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 16 अप्रैल 2022, 05:30 AM Updated: 16 अप्रैल 2022, 05:30 AM
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सिखों के चौथे गुरु श्री रामदास जी थे, जिन्हें गुरु अमरदास जी के बाद गुरु की उपाधि मिली। गुरु रामदास जी को ही अमृतसर शहर की स्थापना करने का श्रेय दिया जाता है। इसके अलावा सिखों के विवाह में आनंद कारज की रचना करने वाले भी गुरु रामदास जी ही थे। आज हम गुरु रामदास जी से जुड़ी कुछ जानकारी आप तक लेकर आए हैं। गुरु रामदास जी का नाम भाई जेठा से गुरु रामदास कैसे पड़ा और उन्हें ये नाम किसने दिया? इसके बारे में जानेंगे…
गुरु रामदास जी का जन्म 9 अक्टूबर 1534 में लाहौर में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। गुरु जी के पिता का नाम भाई हरिदास और माता दया कौर जी थी। गुरु जी के बचपन का नाम भाई जेठा जी था। कम उम्र में ही माता पिता का साया गुरु जी के सिर पर से उठ गया था। जब वो महज 7 साल के थे तो वो अनाथ हो गए थे। इसके बाद वो अपनी नानी के साथ बासरके गांव चले गए। 
जब भाई जेठा जी 12 साल के थे, तब वो सिखों के तीसरे गुरु गुरु अमरदास जी से मिले । भाई जेठा जी ने काफी समय तक गुरु अमरदास जी की बड़ी ही निष्ठा और प्यार से सेवा की। इसे देखकर गुरु अमरदास जी काफी खुश हुए और उन्होंने जेठा जी के साथ अपनी छोटी बेटी बीबी बानी से शादी कराने का फैसला लिया।  
शादी के बाद भी रामदास जी गुरु अमरदास जी की सेवा करते रहे। उनका ये सेवा भाव देखकर गुरु अमरदास जी जान गए कि  जेठा जी ही गुरु गद्दी के लायक हैं। हालांकि इसके बावजूद उन्होंने अपने दोनों जमाईयों की परीक्षा ली। जिसमें सफल होने के बाद 1 सितंबर 1574 में गुरु अमरदास जी ने भाई जेठा को सिखों का चौथे गुरु नियुक्त किया। इसके साथ ही उन्होंने जेठा जी का नाम बदलकर गुरु रामदास जी रख दिया। 
16वीं शताब्दी में गुरु रामदास जी ने एक तालाब के किनारे डेरा डाल लिया था। यहां तालाब के पानी में एक बेहद ही अद्भुत शक्ति थी, जिसके चलते इस पानी को अमृत के समान माना जाता था। तालाब का नाम सरोवर था। इसलिए इस शहर का नाम अमृत+सर- अमृतसर पड़ गया। गुरु रामदास जी के बेटे ने उस तालाब में एक मंदिर का निर्माण कराया, जिसे आज हम स्वर्ण मंदिर के नाम से जानते हैं। 
गुरु रामदास जी ने 30 रागों में शब्द लिखे जिनमें 246 पौड़ी, 138 श्लोक, 31 अष्टपदिस, और 8 वारां है जो गुरु ग्रन्थ साहिब जी में उपलब्ध हैं। गुरु जी ने अपने बेटे अर्जुन को सिखों के पांचवे गुरु के रूप में स्थापित किया। बाद में गुरूजी अमृतसर से गोइंदवाल साहिब चले गए 1 सितम्बर 1581 को गुरु जी ज्योति जोत समा गए।

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