Unnao Rape Case Update: उन्नाव रेप केस एक बार फिर सुर्खियों में है। मंगलवार, 23 दिसंबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सजा निलंबित कर दी और उन्हें जमानत दे दी। यह वही मामला है, जिसमें साल 2019 में एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के आरोप में कुलदीप सेंगर को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। यह फैसला सामने आते ही न सिर्फ पीड़िता और उसका परिवार, बल्कि कई सामाजिक संगठन और विपक्षी दलों के नेता भी नाराज़गी जता रहे हैं।
हालांकि, इस फैसले के बावजूद कुलदीप सेंगर फिलहाल जेल से बाहर नहीं आ पाएंगे, क्योंकि उनके खिलाफ एक अन्य मामले में सजा अभी भी जारी है।
उन्नाव रेप केस: जिसने पूरे देश को झकझोर दिया
अपको बता दें, उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में साल 2017 में हुई यह घटना देशभर में चर्चा का विषय बनी थी। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन विधायक कुलदीप सेंगर ने उसके साथ बलात्कार किया और बाद में परिवार को धमकाया गया। मामला जब तूल पकड़ने लगा तो इसे सीबीआई को सौंपा गया। लंबी सुनवाई के बाद दिसंबर 2019 में ट्रायल कोर्ट ने कुलदीप सेंगर को आईपीसी की धारा 376(2)(बी) और पॉक्सो एक्ट के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
कोर्ट ने माना था कि आरोपी एक प्रभावशाली जनप्रतिनिधि था और उसने अपने पद का दुरुपयोग किया।
हाई कोर्ट ने क्यों निलंबित की सजा? (Unnao Rape Case Update)
वहीं, दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर की अपील पर सुनवाई करते हुए उनकी सजा को निलंबित कर जमानत दी। अदालत ने कहा कि सजा निलंबन का मतलब यह नहीं है कि दोषी को बरी कर दिया गया है। यह केवल अपील लंबित रहने तक एक अंतरिम राहत होती है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि उम्रकैद की सजा पाए व्यक्ति को भी अपील के दौरान जमानत का अधिकार है, बशर्ते कि प्रथम दृष्टया फैसले में कोई गंभीर कानूनी सवाल उठता हो।
लोक सेवक हैं या नहीं? यहीं अटका मामला
हालांकि, इस केस में सबसे अहम सवाल यही रहा कि क्या कुलदीप सेंगर को “लोक सेवक” माना जाए या नहीं। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें लोक सेवक मानते हुए कड़ी सजा दी थी, क्योंकि कानून के तहत यदि कोई लोक सेवक बलात्कार का दोषी पाया जाता है तो सजा और ज्यादा सख्त होती है।
लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट में सेंगर के वकीलों ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार आईपीसी के तहत विधायक को लोक सेवक नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि पॉक्सो कानून में लोक सेवक की परिभाषा के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम को सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह टिप्पणी केवल प्रथम दृष्टया है और अंतिम फैसला अपील के दौरान किया जाएगा।
कितनी सजा काट चुके हैं कुलदीप सेंगर?
हाई कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि कुलदीप सेंगर सात साल पांच महीने से ज्यादा समय जेल में बिता चुके हैं, जबकि पॉक्सो एक्ट के तहत न्यूनतम सजा सात साल है। इसी आधार पर कोर्ट ने सजा निलंबन को उचित माना।
पीड़िता और परिवार की सुरक्षा पर चिंता
पीड़िता के वकीलों ने कोर्ट के सामने जोर देकर कहा कि कुलदीप सेंगर के बाहर आने से पीड़िता और उसके परिवार की जान को खतरा हो सकता है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि इसी मामले से जुड़े घटनाक्रम में पीड़िता के पिता की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है, जिसके लिए सेंगर को दोषी ठहराया गया था।
कोर्ट ने माना कि सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा है, लेकिन यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को सिर्फ इस डर से जेल में नहीं रखा जा सकता कि प्रशासन सुरक्षा देने में नाकाम हो सकता है। अदालत ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिए कि पीड़िता और उसकी मां की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। फिलहाल उन्हें सीआरपीएफ की सुरक्षा मिली हुई है।
जमानत की सख्त शर्तें
दिल्ली हाई कोर्ट ने जमानत देते हुए कई शर्तें भी लगाई हैं। कुलदीप सेंगर पीड़िता के घर से पांच किलोमीटर के दायरे में नहीं जा सकेंगे। इसके अलावा उन्हें हर सोमवार पुलिस के सामने हाजिरी देनी होगी। कोर्ट ने चेतावनी दी कि शर्तों के उल्लंघन पर जमानत रद्द की जा सकती है।
हत्या के मामले में अब भी जेल में
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि कुलदीप सेंगर को साल 2020 में पीड़िता के पिता की गैर-इरादतन हत्या के मामले में 10 साल की सजा सुनाई गई थी। इस मामले में सजा निलंबन की उनकी अर्जी 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज कर दी थी। उसी वजह से वह अभी जेल में ही रहेंगे। हालांकि, इस मामले में भी सेंगर ने दोबारा सजा निलंबन के लिए याचिका दाखिल की है, जो फिलहाल लंबित है।
सीबीआई पहुंची सुप्रीम कोर्ट
इस पूरे मामले में नया मोड़ तब आया, जब सीबीआई ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। जांच एजेंसी का कहना है कि हाई कोर्ट ने कानून की गलत व्याख्या की है। सीबीआई ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही एल.के. आडवाणी बनाम सीबीआई केस में स्पष्ट कर चुका है कि सांसद और विधायक लोक सेवक की श्रेणी में आते हैं।
सीबीआई के मुताबिक, जब भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत विधायक को लोक सेवक माना जा सकता है, तो फिर पॉक्सो जैसे गंभीर कानून में उन्हें इससे बाहर नहीं किया जा सकता।
सीबीआई का तर्क: अपराध क्यों ज्यादा गंभीर?
सीबीआई ने कहा कि पॉक्सो एक्ट की धारा 5(सी) के तहत यदि अपराध किसी लोक सेवक या प्रभावशाली पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा किया जाए तो उसे ‘एग्रेवेटेड’ यानी अधिक गंभीर माना जाता है। एजेंसी के मुताबिक, एक विधायक न केवल संवैधानिक पद पर होता है, बल्कि उसके पास जनता का भरोसा और प्रभाव भी होता है, जिससे उसकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
सीबीआई ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट पॉक्सो कानून के मूल उद्देश्य को समझने में चूक गया, जिसका मकसद बच्चों को यौन शोषण से बचाना और सत्ता के दुरुपयोग पर कड़ी सजा देना है।
जमानत पर भी उठे सवाल
सीबीआई ने जमानत दिए जाने पर भी सवाल खड़े किए हैं। एजेंसी का कहना है कि आजीवन कारावास जैसे गंभीर मामलों में सिर्फ लंबी कैद या अपील में देरी जमानत का आधार नहीं हो सकती। अदालत को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ-साथ समाजिक हित और अपराध की गंभीरता को भी देखना चाहिए।
29 दिसंबर को अहम सुनवाई
अब इस मामले पर सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं। कुलदीप सेंगर को मिली राहत के खिलाफ सीबीआई की याचिका पर 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट की अवकाशकालीन पीठ सुनवाई करेगी। यह फैसला न सिर्फ इस केस के लिए, बल्कि भविष्य में यह तय करने के लिए भी अहम माना जा रहा है कि जनप्रतिनिधियों को पॉक्सो जैसे कानूनों के तहत किस तरह देखा जाएगा।
पीड़िता का परिवार भी सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कह चुका है। ऐसे में आने वाले दिन तय करेंगे कि यह मामला किस दिशा में आगे बढ़ता है और कानून की कसौटी पर न्याय का पलड़ा किस ओर झुकता है।






























