मुअम्मर गद्दाफी एक फरिश्ता था या फिर था बेहद भयानक शैतान?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 24 Apr 2021, 12:00 AM | Updated: 24 Apr 2021, 12:00 AM

जोश और उमंग से भरे एक यंग फौजी के तौर पर मुअम्मर गद्दाफी ने अपनी पहचान बनाई थी लेकिन बुढ़ापा आते आते जब उसके सर पर सत्ता और ताकत का नशा चढने लगा तो उसका मिज़ाज बदल गया और पहचान भी। बुढापा आते आते एक परिवारवादी क्रूर तानाशाह के तौर पर  मुअम्मर गद्दाफी की पहचान बन गई। ये कहानी है अफ्रीकी देश लीबिया के एक तानाशाह की जिसके बारे में जानना बेहद रोमांक होने वाला है तो चलिए जान लेते हैं इस बारे में सबकुछ…

लीबिया पर 6 डेकेड तक गद्दाफी ने अपना राज चलाया। किसी के लिए वो बेमिसाल था तो किसी के लिए वो क्रूर और ज़ालिम था। अरब देशों के साथ ही वेस्टर्न कंट्रीज में गद्दाफी के बारे खूब बातें हुईं। यहां कर की उसे मिडिल ईस्ट के पॉलिटिक्स का ‘पिकासो’ तक कह दिया गया। 42 साल तक लीबिया पर शासन करने वाले गद्दाफी की उम्र जब 27 साल थी तब उसने बिना खून बहाए ही सत्ता को उलटपलट के रख दिया। वो लीबिया की राजशाही को तख्तापलट करके खत्म कर दिया। 

लीबिया के सिर्ते शहर के एक गांव में 7 जून 1942 को पैदा हुए मुअम्मर गद्दाफी एक बेदोविन फैमिली से था। अब आप कहेंगे ये नया सा वर्ड बेदोविन क्या है तो ये उन खानाबदोश अरबी लोगों को कहा जाता है जो कि रेगिस्तान में रहा करते हैं। गद्दाफी अरब को बदलता हुआ देख रहा था और उसने अपना पॉलिटिकल हीरो मिस्र के गमाल अब्देल नासेर को माना था। अब्देल नासेर इस बात की वकालत करते कि वेस्टर्न देशों के उपनिवेशवाद का खात्मा हो। वो अरब राष्ट्रवाद को बढ़ावा देते और उनकी सोच गद्दाफी पर इतनी असरदार थी कि उसने सेना में भर्ती ले ली और फिर बना सिग्नल कॉर्प्स में ऑफिसर।

तेल के भंडारों ने बदल दिया लीबिया को

लीबिया में 1950 के दशक में कई बड़े और अहम तेल के भंडार होने के बारे में खुलासा हुआ। विदेशी पेट्रोलियम कंपनियां तेल निकालतीं और कीमत भी वहीं तय करतीं। ऐसे में आमदनी का करीब आधा भाग भी उनके पास ही जाता। तब लीबिया में किंग इदरिस सत्ता में था। तेल के कई भंडारों ने लिबिया को खूब मुनाफा दिलाया और गरीब से अमीर देशों की लिस्ट में ये देश शामिल हो गया। फिर किंग इदरिस की सरकार पर करप्शन के आरोप लगे और लीबिया में विरोध बढ़ गया। 1960 के दशक हाल ऐसा हुआ कि इदरिस की सरकार के अगेंट्स जनता गुस्से से भर गई।

मिस्र और बाकि अरब देश की जब 1967 में 6 दिन के वार में इजरायल से हार हुई तो लीबिया के किंग इदरिस को इसका जिम्मेदार बताया गया। राजधानी त्रिपोली, बेनगाजी जैसे शहर में प्रॉटेस्ट हुआ। फौज से इदरिस को उम्मीद थी कि उन्हें बचा लेगी लेकिन उसी फौज में कर्नल मुअम्मर गद्दाफी भी था जिसने प्लैनिंग की उनकी राजशाही को खत्म कर देने की।

बिना खून बहाए कैसे गद्दाफी ने सत्ता बदल दिया?

दरअसल, साल 1964 तक मिस्र की तरह लीबिया में गद्दाफी ने ‘फ्री ऑफिसर मूवमेंट’ को शुरू किया।  इस संस्था के लोग सरकार से बचकर मिलते और गद्दाफी इसके लीडर थे। साल 1969 की शुरुआत ही थी और अफवाहें उड़ीं कि लीबिया में तख्तापलट हो गया पर इस संबंध में मुअम्मर गद्दाफी पर किसी को शक नहीं था। 

अक्सर देश से बाहर रहने वाले किंग इदरिस 1 सितंबर 1969 को ग्रीस में थे और अपना इलाज करा रहे थे तभी मिलिट्री की गाड़ियां त्रिपोली और बेनगाजी में सरकारी ऑफिस, पुलिस स्टेशनों और हर प्रमुख जगहों पर जा पहुंची। देश में इतनी ज्यादा अफवाहें थीं तख्तापलट की कि जब हक़ीक़त में तख्तापलट हो गया को किसी ने ध्यान नहीं दिया। फिर जब लोगों ने यकीन किया तो लीडर के तौर पर ‘आर्मी सिग्नल कॉर्प्स’ के युवा कर्नल मुअम्मर गद्दाफी का चेहरा आगे किया गया। लीबिया के क्राउन प्रिंस हैं सैय्यद हसन-अर-रीदा जिनको हिरासत में ले लिया गया था।  

जब तख्तापलट पर किसी को विश्वास नहीं हुआ तो इदरिस के निजी बॉडीगार्ड साथ ही त्रिपोली के बाहर जो अमेरिकी सेना तैनात थी इन गतिविधियों में कोई दखल नहीं दिया। दूसरी तरफ गद्दाफी ने देश को अपने हाथ में लेने के लिए रणनीतिक और मजबूत तरीके से पूरी आर्मी को ही यूज कर लिया था।

ग्रीस में मौजूद किंग इदरिस तख्तापलट की जानकारी पाने के लीबिया नहीं लौटना चाहते थे और इस बारे में उन्होंने मिस्र के गमाल अब्देल नासेर को बताया। दूसरी तरफ देखते ही देखते लीबिया में सिर्फ कुछ ही घंटों में सत्ता बदल गई। बिना किसी का खून खराबे के अब राजशाही खत्म हो गई थी वहां और एक नौजवान कर्नल ने सत्ता अपने हाथ में लिया था। 

जब मिली सत्ता तो…

गद्दाफी के लोकतंत्र बहाली और विकास के वादे से लबरेज इस देश को ‘लीबिया अरब गणतंत्र’ नाम से जाना गया। मुअम्मर गद्दाफी के लंबे शासन काल में लीबिया चाहे जो समझते हो उसके बारे में पर उनके रवैये से दुनिया उसकी मजाक उड़ाती थी और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने तो उसको पागल कुत्ता तक कहा था।

लीबिया में गद्दाफी के खिलाफ जो बोलता उसे या जेल होती या तो उसका कत्ल। हर जगह गद्दाफी की खुफिया पुलिस रहती। हालांकि उसके शासन में घर था लोगों के पास, लोगों के लिए अच्छे अस्पताल, साफ सड़कें और पैसे भी रहे पर कमाई एक सी थी लीबिया और दुबई के लोगों की पर लाइफस्टाइल में फर्क था क्योंकि तेल की कमाई का काफी बड़ा हिस्सा खर्च होता था गद्दाफी के ऐशो-आराम पर।

लीबिया में तख्तापलट के बाद दिसंबर 1969 में मिस्र की खुफिया एजेंसी ने कई नेताओं और सैन्य ऑफिसर्स के साथ मिलकर गद्दाफी का तख्ता पलट में लग गई पर हो न सका। दूसरी तरफ गद्दाफी का तौर तरीका और रवैया बदलने लगा। सेना और खुफिया विभाग में अपने लोग भर्ती किए और धर्म का नाम देकर अंग्रेजी कैलेंडर के महीनों के नाम को चेंज किया।

फिर एक वक्त वो भी आया जब 1972 के बाद दो साल तक लीबिया के इंटर्नल पॉलिटिक्स से गद्दाफी ने दूरी बनाए रखी। मेजर जुनैद को देश का पीएम बनाया पर अफवाहें फैलीं कि कर्नल गद्दाफी फिर सामने आ गए। साल 1973 में तो देश के कानून में बड़ी तब्दीली कर अभिव्यक्ति की आज़ादी को ही बैन किया गया।

गद्दाफी का अंत कैसे हुआ?

कुछ साल बाद गद्दाफी के अगेंट्स कई गुट बने और 1980 के डेकेड में दशक में गद्दाफी पर आरोप लगा नाराज कबाइली गुटों के अगेंट्स जंग छेड़ने का। लीबिया की खुफिया एजेंसी में और पश्चिमी देशों की खुफिया एजेंसियों में नजदीकी बढ़ी और तो और कहते हैं कि लीबिया में अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने अपना केंद्र भी बनाया था। ईसाई बहुल इलाके चाड में गद्दाफी ने 1987 में युद्ध छेड़ दी जिसमें लीबिया के 7,500 सैनिक मार दिए गए। फिर  गद्दाफी से आजादी के लिए लीबिया में वक्त वक्त पर प्रॉटेस्ट होता रहा। साल 2004 में गद्दाफी पर आरोप लगा एक पत्रकार की हत्या कराने के लिए सुपारी देने का, ये सुपारी 10 लाख डॉलर की थी।

दरअसल, लीबिया के साथ दुनिया के ज्यादातर देश अच्छे संबंध रखने चाहते थे और 2009 में G-8 देशों की बैठक में गद्दाफी ने हिस्सा लिया। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा या फिर फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सारकोजी या फिर मिस्र के होस्नी मुबारक एक दूसरे के रिस्पॉन्स में मंच पर मुस्कुराते दिखे पर इसी साल जनवरी सिचुएशंस बदले और ट्यूनिशिया से जो अरब की क्रांति शुरू हुई थी 15 फरवरी को लीबिया तक चली गई। मिस्र में होस्नी मुबारक के हट जाने के बाद लीबिया में भी प्रदर्शन बढ़ा और विदेशों में लीबिया के तैनात कुछ राजदूतों के रेजिग्नेशन से गद्दाफी दबाव में आ गया।

जहां हुआ जन्म वहीं से आई मरने की खबर

खबरें आई कि गद्दाफी की सेना अपने विरोधियों को मार रही है। ऐसे में गद्दाफी और उनकी सरकार पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के साथ ही वेस्टर्न कंट्रीज ने कई तरह की पाबंदियां लगाई।  गद्दाफी की विदेशी प्रॉपर्टी सीज हुई और उसके खिलाफ गिरफ्तार वारंट जारी हुई। फिर संयुक्त राष्ट्र ने मार्च 2011 में लीबिया को नो फ्लाई जोन घोषित किया और फिर नाटो सेनाओं ने हवाई हमले शुरू किए लीबिया की सेना के ठिकानों पर लीबिया के विद्रोहियों को ब्रिटेन और फ्रांस ने तो खुलेआम सपोर्ट किया।

इस जंग का आखिरी मैदान गद्दाफी का अपना शहर सिर्ते बना। यहां गद्दाफी का काफिले पर पहले नाटो के विमानों ने हमला बोला फिर जब गद्दाफी गलियों में छिपा तो उस पर खूब गोली बारी हुई और उसकी मौत हो गई। इस तरह से जहां गद्दाफी पैदा हुआ वहीं उसका 20 अक्टूबर 2011 को अंत हो गया। जिसकी तस्वीरें भी आई0। गद्दाफी का एक बेटा भी मारा गया और पकड़ लिया गया। तीन बेटे और एक बेटी भाग खड़े हुए और बाकियों का कोई पता हीं नहीं चला।

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