नीतीश कुमार का विकल्प माने गए Samrat Chaudhary, अब बीजेपी की कमजोर कड़ी?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 23 Oct 2025, 12:00 AM | Updated: 23 Oct 2025, 12:00 AM

Samrat Chaudhary: बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, और इस चुनावी संग्राम में जहां सभी दल अपनी-अपनी सियासी जोड़तोड़ में लगे हुए हैं, वहीं बीजेपी के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी की सियासी ज़िंदगी भी कड़ी परीक्षा से गुजर रही है। एक वक्त था जब सम्राट चौधरी को बिहार बीजेपी का ‘नीतीश कुमार’ कहा जा रहा था, लेकिन हालात अब कुछ और ही कहानी बयान कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव 2024 के परिणामों ने उनकी सियासी जमीन को कमजोर कर दिया था, और अब प्रशांत किशोर जैसे नेताओं की बयानों ने उनकी इमेज को और चोट पहुंचाई है। आइए जानते हैं कैसे सम्राट चौधरी की राजनीतिक यात्रा की राह में इतने विवादों और समस्याओं का सामना करना पड़ा और उनकी छवि किस तरह डेंट हो गई है।

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लोकसभा चुनाव में पार्टी को नहीं मिला फायदा- Samrat Chaudhary

सम्राट चौधरी का सियासी पतन उस समय शुरू हुआ जब 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को वह परिणाम नहीं मिल सके, जिनकी उम्मीद थी। बीजेपी को 2014 और 2019 में क्रमशः 22 और 17 सीटें मिली थीं, लेकिन 2024 में वह घटकर सिर्फ 12 सीटों पर सिमट गई। सम्राट चौधरी, जो उस वक्त बिहार बीजेपी के अध्यक्ष थे, पर इसका ठीकरा फोड़ा गया। पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने खुलकर यह कहा था कि ‘आयातित’ नेताओं से पार्टी का भला नहीं हो सकता।

बीजेपी को उम्मीद थी कि सम्राट चौधरी को कुशवाहा वोटों का समर्थन मिलेगा, क्योंकि वे कोइरी समुदाय से आते हैं, लेकिन नतीजे इसके उलट रहे। कुशवाहा वोट बीजेपी के बजाय विपक्षी महागठबंधन के उम्मीदवारों के पास गए, जिससे पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ। यही नहीं, सम्राट चौधरी ने खुद भी एक बार यह घोषणा की थी कि आगामी विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा जाएगा, जो बीजेपी समर्थकों के लिए एक बड़ा झटका था।

कोइरी वोटरों पर प्रभाव की कमी

सम्राट चौधरी की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि वे अपनी जाति, यानी कोइरी समुदाय के वोटरों पर प्रभाव बनाने में सफल नहीं हो पाए। लोकसभा चुनाव में कुशवाहा वोटरों ने आरजेडी को अपना समर्थन दिया, जो चौधरी की रणनीति पर पानी फेर गया। इस चुनावी परिणाम से यह साफ हो गया कि सम्राट चौधरी को अपनी बिरादरी पर उतना प्रभाव नहीं है, जितना बीजेपी को उम्मीद थी।

बीजेपी के पारंपरिक कोर वोटर्स से खींचतान

सम्राट चौधरी भले ही बिहार बीजेपी के प्रभावशाली ओबीसी नेता माने जाते हों, लेकिन वे पार्टी के पारंपरिक, मध्यवर्गीय कोर वोटर्स के खांचे में फिट नहीं बैठते हैं। यह वर्ग संगठन, स्थिरता, और साफ-सुथरी राजनीति को प्राथमिकता देता है। सम्राट चौधरी की राजनीतिक यात्रा, जो आरजेडी से जेडीयू और अब बीजेपी तक पहुंची है, बीजेपी के स्थिर और विचारनिष्ठ नेताओं की परंपरा से मेल नहीं खाती। उनकी शैक्षणिक योग्यता पर उठे सवाल और बयानबाजी भी पार्टी के पारंपरिक वोटर्स को असहज करती है।

प्रशांत किशोर की स्ट्रेटेजी से इमेज को नुकसान

जनसुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर ने सम्राट चौधरी को अपनी राजनीति का टारगेट बनाया और उन पर कई गंभीर आरोप लगाए। किशोर ने कहा कि सम्राट चौधरी बीजेपी में केवल इसलिए हैं क्योंकि वे कुशवाहा समुदाय के वोटों को साधने के लिए नीतीश कुमार का तर्ज़ अपनाना चाहते हैं। साथ ही, सम्राट चौधरी की राजनीति को अवसरवादी और जाति-आधारित बताया गया, जिससे उनकी छवि और भी खराब हो गई।

विवादों से घिरी सम्राट चौधरी की छवि

सम्राट चौधरी के नाम के साथ विवादों का पिटारा हमेशा जुड़ा रहा है। शैक्षणिक योग्यता से लेकर व्यक्तिगत बयानबाज़ी तक, उनका नाम हमेशा सुर्खियों में रहता है। हाल ही में, उनकी उम्र और शिक्षा के बारे में भी सवाल उठाए गए। इससे उनकी छवि और भी संदिग्ध हुई। भाजपा ने उन्हें ओबीसी चेहरा बना कर अपनी राजनीति की दिशा तय करने की कोशिश की थी, लेकिन लगातार उठते विवादों ने उन्हें एक विवादित नेता के रूप में स्थापित कर दिया।

आने वाले चुनाव में सम्राट चौधरी का लिटमस टेस्ट

सम्राट चौधरी के लिए आगामी बिहार विधानसभा चुनाव एक बड़े लिटमस टेस्ट की तरह हैं। अगर इस बार भी कुशवाहा वोटरों का बीजेपी में ट्रांसफर नहीं हो पाता, तो सम्राट चौधरी बीजेपी के लिए बोझ बन सकते हैं। उनका राजनीतिक भविष्य अब इस पर निर्भर करेगा कि वे अपनी छवि को कैसे संभालते हैं और क्या वे बीजेपी के लिए कुशवाहा वोटरों को खींचने में सफल हो पाते हैं या नहीं।

इसलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि बिहार विधानसभा चुनाव सम्राट चौधरी के लिए एक चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा कर रहे हैं। बीजेपी के लिए उनका राजनीतिक भविष्य अब अधिक असुरक्षित लग रहा है, और यदि उन्हें कुशवाहा वोटरों का समर्थन नहीं मिलता, तो उनका रोल पार्टी के लिए कठिन हो सकता है। सम्राट चौधरी के सामने अब यह सवाल है कि वे अपनी छवि को सुधार पाते हैं या नहीं, और बिहार की राजनीति में अपनी स्थिति को फिर से मजबूत कर पाते हैं या नहीं।

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