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1984 Sikh Genocide: सिर्फ दिल्ली नहीं, कानपुर से बोकारो तक फैली थी नफरत की आग, 3350 मौतों का वो अनकहा सच

Shikha Mishra | Nedrick News

Published: 30 Jan 2026, 12:12 PM | Updated: 30 Jan 2026, 12:12 PM

1984 Sikh Genocide:  तारीख थी 31 अक्टूबर 1984, पूरे देश समेत दुनियाभर में भारत की सबसे शसक्त महिला और पहली महिला प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी की गोलियों से भून कर हत्या कर देने की खबर आग की तरह फैली… हत्यारे थे उनके दो सिख बॉडीगार्ड… कहने के लिए तो ये इंदिरा गांधी के ऑपरेशन ब्लू स्टार और अलगाववादी नेता भिंडरेवाले की हत्या का बदला था… लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या सिखों के लिए किसी लड़ाई का अंत नहीं बल्कि शुरुआत थी उस नरसंहार की…जो 31 अक्टूबर से लेकर 3 नवंबर 1984 तक सिखों को उससे गुजरना पड़ा था।

इंदिरा गांधी की चिता के साथ राजधानी भी आग में जल रही

इंदिरा गांधी की चिता के साथ साथ पूरी राजधानी दिल्ली भी दंगो की आग में जल रही थी। सिखों को चुन चुन कर मारा जा रहा था… दिल्ली के कई ऐसे इलाके है जहां आज भी इस नरसंहार के जीते जागते साक्ष्य मौजूद है.. सरकारी आकड़ो की माने तो नरसंहार में पूरे देशभर में करीब 3350 लोगो की मौत हुई थी… जिसमें केवल दिल्ली में ही 2800 लोग शामिल थे, लेकिन ये तो केवल वो है जो दिखाया गया था…सच उससे भी बेहद भयावाह था…कहने के लिए दंगे दिल्ली में हुए थे लेकिन दंगो का असर पूरे भारत के सिखों पर पड़ा था.. जब आप सच्चाई खंगालते है तो आपको पता चलता है कि मरने वाले केवल 3350 ही नहीं थे.. ये आकड़े बेहद भहावाह थे.. इस वीडियो में हम जानेंगे कि दिल्ली से बाहर सिखों के साथ 1984 के दंगो में क्या हुआ था..और सहीं मायने में इन दंगो में कितने लोगो ने जान गंवाई थी।

विकिलीक्स केबल लीक की रिपोर्ट

जब आपक सरकारी जांच की रिपोर्ट उठा कर देंखेंगे तो पायेंगे कि जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई तब कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इस मुद्दे को धार्मिक साम्प्रादायिक रूप दे दिया.. हिंदुओ को सिखों के विरूद्ध भड़काया गया… सिखों के इतिहास में ये पहली बार हुआ जब हिंदू, सिखों के खिलाफ हो गए थे,.. और उनके खिलाफ हथियार उठाये गए थे। ये नरसंहार संगठित था। 2011 के विकिलीक्स केबल लीक की रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी सिख दंगो के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जिम्मेदार माना था, इतना ही नहीं सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था।

कि यह हिंसा दिल्ली पुलिस और कुछ केंद्र सरकार के अधिकारियों के समर्थन से आयोजित की गई थी। लोगो को भड़काने के लिए पंजाब में हिंदुओं की हत्याओं के लिए पूरे सिख समुदाय को जिम्मेदार ठहरा कर उन्हें निशाना बनाया गया था फिर भी हैरानी की बात है कि इस मामले में केवल एक ही अपराधी को फांसी की सजा हुई थी, तो क्या हजारों लोगो की हत्या के पीछे केवल एक ही अपराधी था..जवाब सभी जानते है… अब आते है उस मुद्दे पर… जिसके बारे में सरकारी आकड़ो में भी सच नहीं कहा गया है।

सिख यात्रियों को खींचकर बाहर निकाला

दरअसल दंगो के बाद करीब 50 हजार सिखों को दिल्ली से विस्थापित होना पड़ा था।लेकिन इन दंगो का असर केवल दिल्ली में ही नहीं हुआ था, बल्कि पुरे भारत के सिख इससे प्रभावित हुए थे। दिल्ली की हालात की बात करें तो सैकड़ो हथियारबंद लोगों ने दिल्ली में आने वाली बसों और ट्रेनों को रोक कर सिख यात्रियों को खींचकर बाहर निकाला, उन्हें पीट-पीटकर मार डाला और कुछ को ज़िंदा जला दिया गया। दिल्ली के सुल्तानपुरी, मंगोलपुरी, त्रिलोकपुरी और यमुना पार के अन्य इलाके सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए। हमलावरों के पास लोहे की रॉड, चाकू, लाठी और केरोसिन और पेट्रोल थे।

सिखों को तेजाब से नहा दिया गया

वे सिख मोहल्लों में घुस गए, सिखों को अंधाधुंध मार डाला और दुकानों और घरों को तबाह कर दिया, सिख महिलाओं के साथ गैंगरेप किया गया, सिखों को तेजाब से नहा दिया गया। सोर्सेज तो ये भी बताते है कि इन दंगो को हिंसक भयावाह बनाने के लिए जगदीश टाइटलर और एच.के.एल. भगत जैसे नेताओं के इशारे पर तीन दिनों के जेल खोल दिये गए थे, इनमें से खूंखार अपराधियों को आजाद छोड़ा गया और उन्हें सिखों को सबक सिखाने की बात कह कर उनपर टूट पड़ने को कहा गया। कहा तो ये भी जाता है कि सिखों की पहचान के लिए कांग्रेस दंगाईयों को वोटर लिस्ट, स्कूल रजिस्ट्रेशन फॉर्म लिस्ट और राशन लिस्ट दी थी..ताकि सिखों को ही निशाना बनाया जा सकें।

कानपुर में भी सिखों के खिलाफ दंगा

दिल्ली के साथ साथ कानपुर में भी सिखों के खिलाफ दंगा शुरू हुआ, जिसमें करीब 12 लोगो की हत्या हुई, इसके अलावा देश भर में जहां भी सिख बहुल थे, वहां सिखों के खिलाफ हिंसक आंधी चल रही थी, नतीजा दिल्ली के साथ साथ पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और, बिहार में सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे। खासकर कानपुर, झारखंड का बोकारो और जमशेदपुर, जो कि तब बिहार का हिस्सा था, वहां सिखों के साथ हिंसा ज्यादा हुई।

सरकारी आकड़ो को छोड़ दिया जाये तो मीडिया रिपोर्ट बताती है कि असल में इस हिंसा में पूरे देश में केवल 3350 लोगो की ही मौत नहीं हुई थी बल्कि इस हिंसा के कारण 8000 से लेकर 17000 हजार सिखों की हत्या की गई थी। जिसमें सबसे ज्यादा प्रभावित दिल्ली के सिख इलाके थे। पुलिस ने आखों पर पट्टी बांधी थी, और सबकुछ होने दिया.. जिन सिखों ने खुद का बचाव करने के लिए हथियार उठाये, पुलिस ने उल्टा उन पर कार्यवाई की..जो उन 4 दिनों में अन्याय की पराकाष्ठा की कहानी कहती है।

पीड़ितो की दास्तान सुनेंगे तो रूह कांप उठेगी

जब आप आज भी दंगा पीड़ितो की दास्तान सुनेंगे तो रूह कांप उठेगी.. लोगो की आपबीती सुनकर किसी का भी कलेजा फट जायेगा..पूरा का पूरा परिवार जिंदा जलाया गया, औरतो की आबरू लूटी गई..सिख बहुल इलाकों में केवल लाशे और खून ही थे.. लेकिन दुख की बात तो ये है कि करीब 42 साल हो चुके है लेकिन आज भी उन्हें न्याय नहीं मिला.. वो आज भी उन बेगुनाहो की, अपनो की मौत के लिए न्याय का इंतजार कर रहे है, जो बेगुनाह थे, लेकिन चंद राजनीति करने वालों की अहम की भेंट चढ़ गए। नहीं जानते कि न्याय कब मिलेगा….मिलेगा भी या नहीं.. लेकिन ये तो तय है कि सिखों के खिलाफ एक बड़ी साजिश हुई थी.. और जो सरकारी आकड़े कहते है वो भी केवल न्याय को भटकाने के लिए ही है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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