Yogi Adityanath vs Brahmin: उत्तर प्रदेश के बरेली में तैनात सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने प्रांतीय सिविल सेवा (PCS) से सोमवार, 26 जनवरी 2026 को इस्तीफा देकर प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। एक कार्यरत अधिकारी द्वारा खुले तौर पर सरकार की नीतियों के विरोध में दिया गया यह इस्तीफा यूपी जैसे राज्य में बेहद असामान्य माना जा रहा है। अलंकार अग्निहोत्री ने अपने इस्तीफे की वजह केंद्र और राज्य सरकार से जुड़ी दो नीतियों को बताया है… यूजीसी के नए नियम 2026 और शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती तथा उनके शिष्यों के साथ कथित दुर्व्यवहार।
हालांकि दोनों मुद्दों का सीधा आपसी संबंध नहीं है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को ब्राह्मण समुदाय की नाराज़गी से जोड़कर देखा जा रहा है।
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इस्तीफे के पीछे दो बड़े कारण (Yogi Adityanath vs Brahmin)
अलंकार अग्निहोत्री, जो खुद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के अनुयायी बताए जाते हैं, ने धार्मिक गुरु के साथ हुए कथित “अपमान” और उनके शिष्यों पर हमले को लेकर गहरी नाराज़गी जताई। आरोप है कि इस दौरान शिष्यों के साथ बदसलूकी हुई और शिखा खींचने जैसी घटनाएं सामने आईं। अलंकार ने इसे धार्मिक परंपराओं और सम्मान पर सीधा हमला बताया।
दूसरा बड़ा कारण उन्होंने यूजीसी के नए नियम “Promotion of Equity in Higher Educational Institutions Regulations, 2026” को बताया, जिसे उन्होंने भेदभावपूर्ण और एकतरफा करार दिया।
सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरें और वीडियो
अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा पत्र सामने आते ही सोशल मीडिया और न्यूज प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से वायरल हो गया। वायरल तस्वीरों में वह अपने कार्यालय के बाहर लगे बोर्ड पर अपने नाम के सामने “Resign” लिखते नजर आ रहे हैं। एक अन्य फोटो में वह अपने घर के बाहर एक बड़ा पोस्टर लेकर खड़े दिखते हैं, जिसमें यूजीसी नियमों और शंकराचार्य से जुड़े मुद्दों का जिक्र है। घर के बाहर लगी नेम प्लेट और पद की जानकारी इस विरोध को और प्रतीकात्मक बना रही है।
प्रशासनिक सेवा में रहते हुए इस तरह का सार्वजनिक विरोध यूपी में दुर्लभ माना जा रहा है, खासकर उस दौर में जब योगी आदित्यनाथ सरकार में नौकरशाही से पूर्ण वफादारी की अपेक्षा की जाती है।
UGC के नए नियम क्या हैं और विवाद क्यों?
यूजीसी के ये नए नियम जनवरी 2026 में अधिसूचित किए गए। इनका उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकना है, खासकर SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक छात्रों के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न पर सख्ती करना।
इन नियमों के तहत:
- हर उच्च शिक्षा संस्थान में इक्विटी सेल बनाना अनिवार्य है, जिसमें SC/ST/OBC प्रतिनिधियों की मौजूदगी जरूरी होगी।
- शिकायतों पर कार्रवाई न करने पर संस्थानों पर जुर्माना, फंडिंग में कटौती या मान्यता रद्द करने तक का प्रावधान है।
- आलोचकों का कहना है कि नियमों में “अपराधी होने की धारणा” शामिल है, जो SC/ST एक्ट जैसी लगती है।
- सबसे बड़ा विवाद यह है कि फर्जी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर कोई स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान नहीं है।
यूजीसी के आंकड़ों के मुताबिक 2019-20 से 2024-25 के बीच जाति-आधारित शिकायतों में 118% की बढ़ोतरी हुई है। समर्थक इसे जरूरी सुधार बताते हैं, जबकि विरोधी इसे “रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन” और “काला कानून” कह रहे हैं।
ब्राह्मण समुदाय में क्यों बढ़ रहा गुस्सा?
वहीं, ब्राह्मण समुदाय की बात करें तो उत्तर प्रदेश में उनकी आबादी का करीब 10–13% है और ऐतिहासिक रूप से राजनीति व प्रशासन में प्रभावशाली रहा है। समुदाय का आरोप है कि नए यूजीसी नियमों में “जनरल कैटेगरी” को डिफॉल्ट रूप से भेदभाव करने वाला मान लिया गया है। अलंकार अग्निहोत्री ने भी अपने इस्तीफे में इसी बिंदु पर आपत्ति जताई है।
हाल के महीनों में IAS अधिकारी संतोष वर्मा के कथित बयान और अन्य घटनाओं ने ब्राह्मणों के आक्रोश को और हवा दी है। सोशल मीडिया पर #UGC_RollBack और #UGC_काला_कानून_वापस_लो जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। कई कॉलेजों और यूनिवर्सिटी कैंपस में विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं।
योगी आदित्यनाथ बनाम ब्राह्मण?
2027 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव से पहले यह मामला राजनीतिक रंग भी लेता दिख रहा है। ब्राह्मण संगठनों का आरोप है कि योगी सरकार में ठाकुर और ओबीसी समुदाय को ज्यादा तरजीह मिल रही है। सरकारी नौकरियों और सत्ता में प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष खुलकर सामने आ रहा है।
कानपुर में 2020 में विकास दुबे एनकाउंटर के बाद भी ब्राह्मण असंतोष सामने आया था। बीजेपी ने डैमेज कंट्रोल के लिए एक ब्राह्मण को डिप्टी सीएम बनाया, लेकिन नाराज़गी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
बीजेपी संगठन और सरकार में जातीय संतुलन
आंकड़ों पर नजर डालें तो यूपी बीजेपी संगठन के 45 प्रमुख पदाधिकारियों में 9 ब्राह्मण हैं, यानी करीब 20%। योगी सरकार के 54 मंत्रियों में सात ब्राह्मण मंत्री हैं, जो करीब 13% बैठता है। क्षत्रिय समुदाय के भी संगठन और मंत्रिमंडल में सात-सात प्रतिनिधि हैं। वैश्य समुदाय से सात और भूमिहार समुदाय से दो नेता शामिल हैं। संगठन की कमान ओबीसी नेता पंकज चौधरी के हाथ में है। मंत्रिमंडल में 20 ओबीसी मंत्री हैं, यानी करीब 37%।
दलित समुदाय से संगठन में आठ और मंत्रिमंडल में सात नेता हैं। बीजेपी सवर्ण और ओबीसी के बीच संतुलन साधने की कोशिश करती दिखती है, लेकिन जमीनी असंतोष अब भी मौजूद है।
एक इस्तीफा, कई सवाल
अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा भले ही एक व्यक्ति का फैसला हो, लेकिन इसने यूपी में जाति, धर्म, शिक्षा नीति और सत्ता संतुलन से जुड़े कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह मामला प्रशासनिक दायरे तक सीमित रहता है या 2027 के चुनावी समीकरणों को भी प्रभावित करता है।




























