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Trump Tariff War: भारत, रूस और चीन का उभार: क्या टैरिफ से ट्रंप अमेरिका की खोती हुई शक्ति बचा रहे हैं?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 08 Aug 2025, 12:00 AM | Updated: 08 Aug 2025, 12:00 AM

Trump Tariff War: जब दुनिया की सबसे बड़ी ताकतें आपस में टकराती हैं, तो केवल राजनीति या व्यापार नहीं, बल्कि वैश्विक शक्तियों के बीच सत्ता की लड़ाई भी होती है। एक ओर जहां भारत अपनी अर्थव्यवस्था और कूटनीतिक प्रभाव से दुनिया में नए स्थान बना रहा है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका जैसे महाशक्ति की चिंताएं बढ़ती जा रही हैं। अमेरिकी नीतियाँ और उनके द्वारा भारत पर लगाए गए व्यापारिक टैरिफ़ इस बात का संकेत हैं कि अमेरिका को अब अपने एक पुराने दोस्त से ही खतरा महसूस होने लगा है।

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पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के शासनकाल में भारत और अमेरिका के रिश्तों में काफी गर्मजोशी थी, लेकिन जब से डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने, अमेरिकी नीतियों में एक पूरी तरह से नया बदलाव देखा गया। भारत को हमेशा अमेरिका का करीबी दोस्त माना गया, लेकिन अब ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने भारत को एक नई चुनौती दी है, और उस चुनौती का नाम है टैरिफ। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अमेरिका को डर है कि भारत अब वैश्विक मंच पर उसकी भूमिका चुनौती दे सकता है? आइए जानते हैं कि कैसे बदल रही है दुनिया और कैसे भारत इस नई स्थिति में अपने कदम मजबूती से रख रहा है।

अमेरिका की नई नीति: एकतरफा कूटनीति का दबाव – Trump Tariff War

अमेरिका, जो हमेशा भारत को अपना मित्र राष्ट्र बताता रहा है, अब भारत पर अपनी एकतरफा कूटनीतिक और व्यापारिक इच्छाएं थोप रहा है। भारत द्वारा इन इच्छाओं को ठुकराने के बाद अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी के टैरिफ़ लगा दिए। ये कदम न केवल व्यापारिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वैश्विक शक्ति समीकरणों को भी प्रभावित कर रहे हैं। अमेरिका के इस कड़े कदम का मुख्य कारण यह है कि वह भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव से चिंतित है, खासकर जब भारत, रूस और चीन जैसे देशों के साथ साझेदारी मजबूत कर रहा है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से बदलते विश्वव्यवस्था के नियम

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत रूस के बीच शक्ति का बंटवारा हुआ था। लेकिन 1990 के दशक के अंत तक सोवियत रूस का पतन हो गया और अमेरिका दुनिया का एकमात्र सुपरपावर बन गया। हालांकि, 2000 के बाद भारत की अर्थव्यवस्था ने एक नया मोड़ लिया। भारत ने वैश्वीकरण और उदारवाद की दिशा में क़दम बढ़ाए और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में 8% की विकास दर हासिल की। इसके बाद, भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

चीन की बढ़ती शक्ति और अमेरिका की चिंता

वहीं चीन भी अपनी आर्थिक ताकत में तेजी से बढ़ रहा है। 2001 में WTO में शामिल होने के बाद चीन ने वैश्विक व्यापार में अपनी हिस्सेदारी को बढ़ाया और 2024 तक वह 14% वैश्विक निर्यात करता है। बुनियादी ढांचे में भारी निवेश और तकनीकी विकास ने चीन को दुनिया में प्रमुख नवाचार शक्ति बना दिया है। 2024 में चीन की GDP अमेरिका से कुछ ही कम होकर 18.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने की संभावना है।

भारत और चीन का उभार अब अमेरिका के लिए एक चुनौती बन गया है, खासकर तब जब ये दोनों देशों ने रूस के साथ मिलकर BRICS और SCO जैसे मंचों पर अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती दी है।

अमेरिका की टैरिफ नीति: सिर्फ व्यापार नहीं, सत्ताई प्रभुत्व की चिंता

ट्रंप प्रशासन ने भारत, चीन और कई अन्य देशों पर नए टैरिफ़ लगाए। यह केवल व्यापारिक कदम नहीं था, बल्कि एक रणनीतिक चाल भी थी। ट्रंप का असल डर यह था कि अगर भारत और चीन जैसे देश रूस के साथ मिलकर वैश्विक संस्थाओं, व्यापार और वित्तीय संस्थानों में अमेरिका को दरकिनार कर देते हैं, तो वाशिंगटन की पकड़ कमजोर हो जाएगी। यही कारण है कि अमेरिका ने टैरिफ़ का इस्तेमाल आर्थिक हथियार के रूप में किया।

ब्रिक्स, SCO और नई साझेदारियाँ: अमेरिका की दवाब के खिलाफ भारत की रणनीति

भारत, चीन और रूस का बढ़ता गठबंधन अब पश्चिमी देशों की शक्ति को चुनौती दे रहा है। BRICS देशों के पास अब वैश्विक GDP का 26% हिस्सा है, जो G-7 के 44% से कम है, लेकिन यह तेजी से बढ़ रहा है। भारत और चीन, रूस से 80% से अधिक कच्चा तेल खरीदते हैं, और यह साझेदारी अमेरिकी शक्ति को कमजोर कर रही है।

भारत ने चीन के साथ सीमा विवाद और प्रतिस्पर्धा के बावजूद अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखा है। इसका मतलब यह है कि भारत न तो पूरी तरह से अमेरिकी खेमे में है, न ही चीन और रूस के खेमे में।

अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व: क्या भारत-रूस-चीन गठबंधन इसे कमजोर कर सकता है?

अमेरिका का डर यह है कि अगर भारत, रूस और चीन मिलकर डॉलर के बजाय अपनी मुद्राओं का उपयोग करें या BRICS के गैर-डॉलर व्यापार को बढ़ावा दें, तो अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व (US Dollar Dominance) कमजोर हो सकता है। 2024 तक वैश्विक व्यापार में डॉलर का हिस्सा 58% तक कम हो गया है, जो 2000 में 71% था।

विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप की टैरिफ नीति का असली उद्देश्य यही है अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को बचाए रखना।

भारत का आत्मनिर्भर और स्वतंत्र दृष्टिकोण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह स्पष्ट किया है कि भारत के लिए उसकी अर्थव्यवस्था और किसानों का हित सर्वोपरि है, और वह किसी भी देश के दबाव में आकर अपनी नीति नहीं बदलेगा। मोदी का यह बयान यह दर्शाता है कि भारत अब अपनी नीति और आर्थिक दृष्टिकोण में अधिक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बन चुका है।

बदलती वैश्विक व्यवस्था

ट्रंप के द्वारा लगाए गए टैरिफ़ और अमेरिका की बढ़ती चिंता के बावजूद, भारत और उसके सहयोगी देशों ने वैश्विक मंच पर अपनी रणनीति में बदलाव किया है। भारत, रूस और चीन के बीच बढ़ती साझेदारी, BRICS और SCO के मंचों पर भारत की बढ़ती भूमिका, और वैश्विक व्यापार में बढ़ते विकल्प, ये सब संकेत दे रहे हैं कि दुनिया अब एक बहुपक्षीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। भारत की बढ़ती ताकत और आत्मनिर्भरता से अमेरिका की चिंताएँ स्पष्ट हैं, और यही ट्रंप का असली डर है।

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