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सिख इतिहास के वो 8 शूरवीर जिनका बलिदान कभी भुलाया नहीं जा सकता

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 08 May 2024, 12:00 AM | Updated: 08 May 2024, 12:00 AM

भारत वीरों की भूमि रहा है, यहां का इतिहास मराठों और क्षत्रियों की वीरता की कहानियों से भरा पड़ा है, वहीं सिख योद्धाओं की वीरता और बलिदान की भी सैकड़ों कहानियां सुनने को मिलती हैं। सिख इतिहास पर नजर डालें तो मुगलों से युद्ध में पुरुषों के साथ-साथ वीरांगनाओं महिलाओं ने भी अहम भूमिका निभाई थी। वास्तव में 5वें गुरु अर्जन की मुगलों द्वारा हत्या के बाद से सिख एक सैन्यीकृत लोग रहे हैं। छठे गुरु, हरगोबिंद मुगल साम्राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाले पहले व्यक्ति थे, उन्होंने मिरी और पीरी की जुड़वां तलवारें उठाईं और अकाल सेना बनाई, जो पहली स्थायी सिख सेना थी। 9वें गुरु, तेग बहादुर ने कई लड़ाइयों में भाग लेकर इस परंपरा को जारी रखा, लेकिन यह 10वें गुरु, गोबिंद सिंह थे, जिन्होंने सिखों को एक अलग लड़ाकू राष्ट्र के रूप में औपचारिक रूप दिया और खालसा का निर्माण किया। इसके साथ ही लड़ाई अब केवल सिख सेना की नहीं रही, बल्कि अत्याचार के खिलाफ लड़ना हर सिख की जिम्मेदारी थी। ऐसे में आज हम आपको 8 ऐसे योद्धाओं के बारे में बताएंगे जिन्होंने अपनी वीरता से दुश्मनों को परास्त कर दिया।

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माई भागो

सिख वीरांगना माई भागो एक प्रतिष्ठित महिला सिख योद्धा थीं, जिन्होंने मुगलों के खिलाफ गुरु गोबिंद सिंह की सेना का नेतृत्व किया था। उन्होंने मुक्‍तसर झील पर 29 दिसंबर 1705 को भयंकर युद्ध में महज 40 सिख योद्धाओं के साथ मुगलों की 10 हजार सैनिकों की विशाल फौज को घुटनों पर ला दिया था। माई भागो का जन्‍म अमृतसर के पास एक गांव में हुआ था। माई भागो इतनी वीर थीं कि सिखों के दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह ने उन्हें अपना अंगरक्षक नियुक्त किया था। माई भागो की दो पीढ़ियों ने गुरुओं की सेवा की थी।

बाबा दीप सिंह

बाबा दीप सिंह पंजाब की धरती के शूरवीर योद्धा थे। उनका बलिदान आज भी सिख धर्म के लिए एक मिसाल है। बाबा दीप सिंह का जन्म 1682 में अमृतसर के गांव बहु पिंड में हुआ था। 12 वर्ष की आयु में बाबा दीप सिंह जी अपने माता-पिता के साथ आनंदपुर साहिब गये। वहां बाबा दीप सिंह की मुलाकात सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी से हुई। 18 साल की उम्र में उन्होंने अमृत छका और सिखों को सुरक्षित रखने की शपथ ली। एक बार युद्ध के कारण सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु ग्रंथ साहिब की जिम्मेदारी बाबा दीप सिंह को सौंप दी। बाबा दीप सिंह ने सिख धर्म की रक्षा के लिए अपना सिर बलिदान कर दिया। मुगल शासकों से लड़ते समय उनका सिर धड़ से अलग हो गया और उन्हें सिख धर्म की रक्षा याद आ गई और सिर धड़ से अलग होने के बावजूद उनका शरीर सीधा खड़ा हो गया, उन्होंने स्वयं अपना सिर उठाया और श्री हरमंदिर साहिब अमृतसर की परिक्रमा की और वहीं अपने प्राण त्याग दिए।

बाबा बघेल सिंह

बाबा बघेल सिंह एक अच्छे सैनिक होने के साथ-साथ एक बहुत अच्छे राजनीतिक वार्ताकार भी थे और कई विरोधियों को अपने पक्ष में करने में सक्षम थे। बाबा बघेल सिंह एक ऐसे सिख योद्धा थे जिन्होंने औरंगजेब के पोते को हराकर दिल्ली के लाल किले पर कब्जा कर लिया था और केसरिया झंडा भी फहराया था। वह एक सिख योद्धा थे, जिन्होंने औरंगजेब के पोते (शाह आलम) से दिल्ली में तलवार की नोक पर 7 गुरुद्वारे बनवाए, जहां गुरु साहिबान के चरण पड़े थे।

जस्सा सिंह रामगढि़या

जस्सा सिंह रामगढि़या (1723 – 1803) सिख परिसंघ की अवधि के दौरान एक प्रमुख सिख नेता थे। उन्होंने दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह के मार्गदर्शन में सिख पंथ की सेवा की। उन्होंने प्रसिद्ध सिख शहीद और विद्वान भाई मणि सिंह के साथ काम किया। वह रामगढि़या सेना (मिसल) के मिसलदार प्रमुख नेता थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी भी मुगलों के सामने घुटने नहीं टेके।

जस्सा सिंह अहलूवालिया

सिख इतिहास में जब भी महान योद्धाओं की बात होती है तो ‘सुल्तान-उल-कौम’ सरदार जस्सा सिंह अहलूवालिया का नाम सबसे पहले आता है। बाबा जस्सा सिंह अहलूवालिया ‘सिख संघ’ के शासनकाल के दौरान एक प्रमुख सिख नेता थे, जो ‘दल खालसा’ के सर्वोच्च नेता होने के साथ-साथ ‘अहलूवालिया मिसल’ के मिसलदार भी थे। बाबा जस्सा सिंह अहलूवालिया ने 1772 में कपूरथला राज्य की स्थापना की। 1761 में, जस्सा सिंह अहलूवालिया के कुशल नेतृत्व में, सिखों ने अहमद शाह अब्दाली पर हमला किया, जो ‘पानीपत की लड़ाई’ से लौट रहा था और 2200 हिंदू महिलाओं को उसके चंगुल से मुक्त कराया।

बंदा सिंह बहादुर

सिख इतिहास में सिख गुरुओं के बाद बंदा सिंह बहादुर का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। गुरु गोबिंद सिंह से मिलने के बाद उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण लिया। बिना सेना और हथियारों के 2500 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद डेढ़ साल के भीतर सरहिंद पर कब्ज़ा कर लिया गया और खालसा राज की नींव रखी गई। एक समय बंदा सिंह की सेना में तीन साथी थे, जिनका दायरा तेजी से बढ़ता गया और देखते-देखते सेना में 8 हजार सैनिक जुड़ गए।

चार साहिबज़ादे

17वीं शताब्दी के अंत में गुरु गोबिंद सिंह और माता जीतो जी के घर चार साहिबजादों का जन्म हुआ, जिनके नाम हैं साहिबजादा अजीत सिंह, साहिबजादा जुझार सिंह, साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह था। मुगलों द्वारा इन्हें जेल में डाल दिया गया और विभिन्न कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस्लाम में परिवर्तित होने पर दया की पेशकश के बावजूद, ये युवा भाई अपनी सिख मान्यताओं पर दृढ़ रहे। उन्होंने अपने धर्म को त्यागने से इनकार कर दिया और इसके बजाय शहादत को चुना। चार साहिबजादे ने अपने छोटे लेकिन असाधारण जीवन में सिख इतिहास पर एक अमिट छाप छोड़ी।

महाराजा रणजीत सिंह

पंजाब पर शासन करने वाले शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह ने अपना पहला युद्ध 10 साल की उम्र में लड़ा और 12 साल की उम्र में राजगद्दी संभाली। 18 साल की उम्र में लाहौर पर कब्ज़ा कर लिया। अपने 40 वर्षों के शासनकाल में उन्होंने अंग्रेजों को अपने साम्राज्य पर भी आक्रमण नहीं करने दिया। उनकी वीरता की कहानियां आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं।

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