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Recession in India 2026: मंदी के डर के बीच भारत की अर्थव्यवस्था कैसे कर रही है मुकाबला? जानें रिपोर्ट में क्या कहा

Nandani | Nedrick News

Published: 02 Feb 2026, 02:13 PM | Updated: 02 Feb 2026, 02:19 PM

Recession in India 2026: दुनिया के बाजारों में इस समय काफी हलचल देखने को मिल रही है। कहीं जंग की वजह से तनाव है, तो कहीं ट्रेड नियमों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे माहौल में ज्यादातर देश अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश में जुटे हैं। लेकिन इसी बीच भारत के लिए एक के बाद एक दो ऐसी खबरें आई हैं, जो आने वाले समय को लेकर उम्मीद बढ़ा रही हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) दोनों की ताजा रिपोर्ट्स ने साफ कर दिया है कि साल 2026 में भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा।

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UN की रिपोर्ट: भारत की ग्रोथ पर भरोसा (Recession in India 2026)

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ‘विश्व आर्थिक स्थिति और संभावनाएं 2026’ में भारत को लेकर काफी सकारात्मक तस्वीर पेश की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2026 में जहां पूरी दुनिया की औसत विकास दर सिर्फ 2.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है, वहीं भारत 6.6 प्रतिशत की मजबूत ग्रोथ दर्ज कर सकता है।

यूएन का मानना है कि भारत की घरेलू मांग इतनी मजबूत है कि वैश्विक उथल-पुथल का इस पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। चाहे अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियमों में बदलाव हो या दुनिया के किसी हिस्से में तनाव, भारत की अर्थव्यवस्था अपनी पकड़ बनाए रखने में सक्षम रहेगी। यह भरोसा भारत के मजबूत उपभोक्ता बाजार और लगातार बढ़ते निवेश से जुड़ा है।

SBI की रिपोर्ट ने बढ़ाई उम्मीदें

यूएन के बाद देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की रिपोर्ट ने तो तस्वीर और भी उजली कर दी है। एसबीआई का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.5 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह आंकड़ा सरकार और आरबीआई के अनुमानों से भी थोड़ा ज्यादा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि देश का बिजनेस माहौल सुधरा है और टैक्स कलेक्शन लगातार बेहतर हो रहा है। इससे यह साफ होता है कि भारत की आर्थिक सेहत मजबूत है और वित्तीय घाटे को लेकर चिंता काफी हद तक कम हो चुकी है। एसबीआई का मानना है कि अब भारत की आर्थिक नींव इतनी मजबूत हो गई है कि वह किसी भी चुनौती का सामना कर सकता है।

वैश्विक मंदी की आशंका, फिर भी भारत क्यों मजबूत?

संयुक्त राष्ट्र ने अपनी रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था लंबे समय तक सुस्ती के दौर में रह सकती है। अमेरिका जैसे देशों में व्यापार नीतियों में बदलाव और भू-राजनीतिक तनाव का असर साफ दिख रहा है। महंगाई की वजह से दुनिया भर में आम लोगों का बजट बिगड़ा हुआ है।

लेकिन भारत के मामले में हालात अलग नजर आते हैं। भारत ऐसी इकलौती बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है, जिसकी ग्रोथ रेट 6 प्रतिशत से ऊपर रहने की उम्मीद है। सरकार का भी अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में जीडीपी 7.4 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ सकती है।

फिर खतरे कहां हैं?

यह कहना गलत होगा कि भारत पर बिल्कुल भी जोखिम नहीं है। सबसे बड़ा खतरा कच्चे तेल की कीमतों से जुड़ा है। अगर इंटरनेशनल मार्केट में तेल महंगा होता है, तो भारत पर सीधा असर पड़ता है। इसके अलावा वैश्विक शेयर बाजारों में उथल-पुथल और अमेरिका की टैरिफ नीतियां भी कुछ सेक्टरों के लिए परेशानी खड़ी कर सकती हैं।

भारत का पब्लिक डेट भी एक चुनौती है। कर्ज और जीडीपी का अनुपात करीब 80 प्रतिशत के आसपास है, जिससे सरकार के पास बड़े पैमाने पर खर्च बढ़ाने की गुंजाइश सीमित हो जाती है।

हालांकि इन सबके बावजूद फिलहाल 2026 में भारत के पूरी तरह मंदी में जाने की संभावना कम ही दिखती है। हां, कुछ सेक्टर, जैसे एक्सपोर्ट से जुड़े उद्योग या लग्जरी और डिस्क्रेशनरी खर्च पर निर्भर बिजनेस थोड़ा दबाव महसूस कर सकते हैं।

क्या भारत पहले भी मंदी झेल चुका है?

भारत के आर्थिक इतिहास में स्लोडाउन के दौर जरूर आए हैं, लेकिन पूरी तरह की मंदी बहुत कम देखने को मिली है। 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट इसका अच्छा उदाहरण है। जब अमेरिका और यूरोप की अर्थव्यवस्थाएं बुरी तरह लड़खड़ा गई थीं, तब भारत पर भी असर पड़ा, लेकिन देश मंदी में नहीं गया। उस समय भारत की ग्रोथ जरूर गिरी करीब 8 प्रतिशत से घटकर 3 प्रतिशत के आसपास आ गई लेकिन यह फिर भी पॉजिटिव रही।

इसकी वजह थी भारत की मजबूत घरेलू मांग, सीमित विदेशी जोखिम, सख्त बैंकिंग नियम और सरकार व आरबीआई की समय पर की गई नीतिगत पहल।

2020 में कोरोना महामारी के दौरान हालात बिल्कुल अलग थे। सख्त लॉकडाउन की वजह से आर्थिक गतिविधियां लगभग ठप हो गईं। उस साल भारत की जीडीपी करीब 5.8 प्रतिशत तक गिर गई, जो आजादी के बाद की सबसे बड़ी गिरावट थी। नौकरी गईं, कारोबार बंद हुए और गरीबी बढ़ी।

लेकिन यही भारत की ताकत भी थी कि उसने वहां से वापसी की। 2021 के आखिर तक ग्रोथ फिर 9 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई। यानी झटका बड़ा था, लेकिन रिकवरी भी उतनी ही तेज रही।

आम आदमी के लिए क्या मायने?

हालांकि, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का सीधा फायदा आम लोगों को मिलता है। इससे नए रोजगार के मौके बनते हैं, आमदनी बढ़ती है और बाजार में भरोसा कायम रहता है। भले ही दुनिया में सप्लाई चेन को लेकर दिक्कतें हों या महंगाई का दबाव बना रहे, लेकिन भारत की मजबूत ग्रोथ यह संकेत देती है कि देश का बाजार सुरक्षित हाथों में है।

सरकार के हालिया आंकड़े भी बताते हैं कि भारत आत्मनिर्भर बनने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है। इसका असर आने वाले वर्षों में और साफ दिखेगा, जब भारत न सिर्फ अपनी जरूरतें खुद पूरी करेगा, बल्कि दुनिया की आर्थिक रफ्तार को भी नई दिशा देगा।

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Nandani

nandani@nedricknews.com

नंदनी एक अनुभवी कंटेंट राइटर और करंट अफेयर्स जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में चार वर्षों का सक्रिय अनुभव है। उन्होंने चितकारा यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और मास कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने न्यूज़ एंकर के रूप में की, जहां स्क्रिप्ट लेखन के दौरान कंटेंट राइटिंग और स्टोरीटेलिंग में उनकी विशेष रुचि विकसित हुई। वर्तमान में वह नेड्रिक न्यूज़ से जुड़ी हैं और राजनीति, क्राइम तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों पर मज़बूत पकड़ रखती हैं। इसके साथ ही उन्हें बॉलीवुड-हॉलीवुड और लाइफस्टाइल विषयों पर भी व्यापक अनुभव है।

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