Srinagar Airfield Battle : अभी हाल ही मे 23 जनवरी के दिन बॉक्स ऑफिस पर वॉर ड्रामा फिल्म बॉर्डर 2 रीलिज हुई है, और फिल्म ने एक बार फिर से देश पर दुश्मनों से लड़ने वाले हमारे असली हीरोज की कहानी को बेहद करीब से जानने का मौका मिला है। बॉर्डर 2 में हमारी तीनों सेना के शौर्य और पराक्रम को दिखाया है… और इसी में से एक है इंडियन एयरफोर्स ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों का साहस और शोर्य की कहानी… निर्मल सिंह शेखों, जिसका रोल प्ले किया है पंजाबी सिंगर और एक्टर दिलजीत दोसांझ ने.. शेखों, जिन्हें उनकी बहादुरी और हौसले के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानिक किया गया था।
शेखों आज तक एयरफोर्स के इकलौते परमवीर चक्र से सम्मानित इंडियन एयरफोर्स ऑफिसर है, उनकी बहादुरी के किस्से आज भी पंजाब की गलियों में गायें जाते है.. कैसे उन्होंने अपने छोटे से फाइटर प्लेन से न केवल पाकिस्तानी सेना के छक्के छुड़ाये बल्कि दुश्मनों के बीच में उन्होंने दुश्मनों के हौसले पस्त कर दिये थे। अकेले होते हुए भी उन्होंने मैदान छोड़ने के बजाय सीना तान कर वीरगती को चुना..अपने इस वीडियो में हम इसी बहादुर बेटे भारत के एयरफोर्स के इकलौते परमवीर चक्र सम्मानित निर्मलजीत सिंह शेखों के उस हौसले की कहानी जानेंगे, जिससे जानने के बाद आप भी उन्हें सैल्यूट किये बिना नहीं रह पायेंगे।
कौन थे निर्मलजीत सिंह शेखों
17 जुलाई 1945 को पंजाब के लुधियाना जिले के छोटे से गांव इसेवाल में फ्लाइट लेफ्टिनेंट तारलोक सिंह सेखों के घर जन्में थे निर्मलजीत सिंह शेखों। पिता को देख कर बचपन से ही देश के लिए कुछ कर दिखाने का जज्बा उनके अंदर रहा था, इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की, लेकिन दिल आसमान की रक्षा करना चाहता था, फिर क्या था 4 जून 1967 को पायलट के रूप में एयरफोर्स जॉइन कर लिया,जहां शेखों ने सेखों को मिग-21 लड़ाकू विमान उड़ाने का गहन प्रशिक्षण मिला और उनकी पोस्टिंग वायुसेना की 18 स्क्वॉड्रन में हुई। पोस्टिंग के वक्त वो मात्र 22 साल के थे, लेकिन उनका अनुशासन, उनका कड़ा स्वाभाव, और निडरता से हर मुसीबत का सामना करने की उनकी कला के कारण वो अपने साथियो के बीच काफी प्रचलित थे।
1971 के वॉर की कहानी
1971 के वॉर की शुरुआत हो चुकी थी, पूर्वी पाकिस्तान को आजाद कराने की जंग जारी थी, तो वहीं पाकिस्तान को मौका मिला भारत पर हमला करने का..कश्मीर पर पाकिस्तान की पहले से ही नजर ही थी, और श्रीनगर एयरफील्ड एयरफोर्स स्टेशन रणनीतिक रूप से भारतीय एयरफोर्स के लिए काफी अहम था, 14 दिसंबर 1971 को अचानक पाकिस्तान की वायुसेना ने ऑपरेशन चंगेज खान के तहत F-86 सेबर फाइटर जेट्स से श्रीनगर एयरबेस के रनवे को बारूद का ढेर बना दिया। ये हमला अचनाक हुआ था… और उस वक्त ड्यूटी पर मौजूद थे 26 साल के निर्मलजीत सिंह शेखों.. शेखों समझ गए थे कि पाकिस्तान कश्मीर के एयरबेस को इसीलिए ध्वस्त कर रहा है ताकि कश्मीर में भारतीय हवाई ऑपरेशन को तोड़ जा सकें, और कश्मीर पर पाकिस्तान का कब्जा हो सकें, लेकिन बहादुर शेखों ने ध्वस्त पड़े रनवे पर ही उड़ने भरने का फैसला किया दुश्मनों के छक्के छुड़ाने का फैसला किया।
शेखों ने अकेले दुश्मन का सामना किया
इस वक्त शेखों के साथ उनके साथी फ्लाइंग लैफ्टिनेंट घुम्मन भी उनके साथ थे। सुबह 8 बजकर 2 मिनट पर उन्हें चेतावनी मिली थी, और मात्र 10 सेकेंच के बाद दोनो ने फैसला किया कि वो उड़ान भरेंगे, 8 बजकर 4 मिनट पर गड्ढो के बीच से दोनो ने हवा में उड़ान भरी थी, जिसमें पहले घुम्मन के जहाज ने उड़ान भरी और फिर शेखों के जहाज ने लेकिन इसी बीच F-86 सेबर जेट ने बम गिरा दिया था, जिससे एयर फील्ड से कॉम्बैट एयर पेट्रोल का सम्पर्क सेखों तथा घुम्मन से टूट गया था नतीजा ये हुआ कि शेखों ने अकेले दुश्मनों का सामना करने का फैसला किया थोड़ी देर के बाद शेखों की आवाज रेडियो पर सुनाई दी कि वो दुश्मनों के दो जहाजों पीछे है और उन्हें जाने नहीं दूंगा।
जिसके कुछ देर बाद एक F-86 सेबर जेट नीचे गिरता हुआ नजर आया था, उसके बाद फिर से शेखों की आवाज आई..मैं मुकाबले में हूं और मुझे मजा आ रहा है, मेरे आसपास दो सेबर जहाज के एक का मैं पीछा कर रहा हूं और एक मेरे साथ चल रहा है। इसके बाग दुश्मनों का एक और जहाज नीचे गिरा, लेकिन थोड़ी देर बाद उनकी आवाज फिर से आई शायद मेरा जेट निशाने पर आ गया है, घुम्मन अब तुम मोर्चा संभालो. ये उनके आखिरी शब्द थे, उसके बाद शेखों के विमान का मलबा श्रीनगर शहर से बेस की ओर आने वाली सड़क के पास एक खाई में मिला, लेकिन उसका पूरा अवशेष नहीं मिला क्योंकि जिस दुर्गम पहाड़ियों में वो गिरा था वहां जाना आसान नहीं थी..शेखों शहीद हो चुके थे।
दुश्मन सेना ने भी की तारीफ
कहते है कि शेखों के हौसले और उनके बुलंद इरादों को देखकर 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उनके विमान को गिराने वाले पायलट सलीम बेग मिर्जा ने भी उनकी तारीफ की थी। उन्होंने कहा कि फ्लाइंग ऑफिसर सेखों ने वन वर्सेज 6 की लड़ाई की, लेकिन उन्होंने हारने के बजाये अपने बुलंग हौसले और वीरता का परचम लहराया।
शेखों की शहीदी की खबर जब उनके गांव में लगी तो पूरा गांव सदमें में था, उनकी मात्र 6 महीने पहले ही शादी हुई थी, 26 साल के शेखों अपनी बहादुरी और साहस से हमेशा के लिए अपना नाम सुनहरे अक्षरो में लिखवा दिया था। मरणोँपरांत उनकी बहादुरी के लिए 1972 में उन्हें सेना के सबसे बड़े सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। वो वायुसेना के इकलौते जवान है जिन्हें परमवीर चक्र से सम्मानिक किया गया था। खेशों की बहादुरी, उनकी कहानी हर एक सैनिक के लिए हौसला बुलंद करने वाली है.. शेखों की बहादुरी के लिए उन्हें हमेशा सैल्यूट किया जायेगा।




























