Mini Punjab in Tripura: हिंदू पुराणों के अनुसार जब देवी सती के 51 खंड हुए तो वो खंड जहां भी गिरे वहां एक मंदिर बना.. और उन्ही में एक मंदिर है त्रिपूर सिंदूरी..त्रिपूर… जिसका नाम सुनते है आपके मन मे भारत का एक खूबसूरत राज्य त्रिपुरा आता है.. जी हां, इतिहास में कई ऐसी कहानी है मौजूद है, जो भारत के पूर्वोतर में बसी एक छोटे से राज्य त्रिपुरा की कहानी कहती है। त्रिपुरा..जो कि महाभारत काल से जुड़ा है, जहां महान सम्राट अशोक ने प्रवास किया था… आज भारत का तिसरा सबसे छोटा राज्य है।
महाभारत में इसे कीरात देश कहा जाता था, ब्रिटिश काल में त्रिपुरा जैसा एक क्षेत्र था जिसे हिल टिप्पेरा कहा जाता था, हालांकि त्रिपुरा एक हिंदू बहुल राज्य है, जहां 2011 के आकड़ो के अनुसार करीब 3063903 हिंदू थे, जो कि त्रिपुरा की आबादी का 83.4 प्रतिशत था, हालांकि दूसरे स्थान पर इस्लाम है, तो वहीं सबसे कम आबादी सिखो की थी, जो कि मात्र 0.03 प्रतिशत थी, लेकिन फिर भी सिखों की यहां अपनी प्रमुख पहचान है, जिसका नाता असम के सिखों से है, अपने इस वीडियो में हम त्रिपुरा में बसे मिनी पंजाब के बारे में जानेंगे..कैसे बसा यहां मिली पंजाब।
मिनी पंजाब इन त्रिपुरा
त्रिपुरा में सिखो के इतिहात की बात की जाये तो ये सिखो के नौवे गुरु गुरु तेग बहादुर से जुड़ा है। कहा जाता है कि जब उन्होंने असम में अपनी यात्रा की थी, और वो असम के धुबरी में रूके थे, जहां प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी भी रूके थे। इस दौरान नौवे गुरु ने धुबरी में गुरुद्वारा गुरू तेग बहादुर साहिब की नींव रखी थी.. उनके प्रवास के दौरान ही उनकी मुलाकात त्रिपुरा के मणिक्य राजवंश की महारानी से हुई थी, गुरु साहिब से मिलकर महारानी सिख धर्म से काफी प्रभावित हुई थी। महारानी ने नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर से अपने राज्य के लिए आशिर्वाद लिया था, और कुछ चीजें भी भेट की थी। हालांकि तब तक सिख धर्म त्रिपुरा में ज्यादा प्रचलित नहीं हुआ था।
सिखों ने त्रिपुरा के चांदमारी में डेरा डाला
लेकिन त्रिपुरा में सिखों का आगमन असम में सिखो के आगमन के साथ शुरु हुआ था। 1931 के आसपास बर्मा यानि की आज के म्यांमार से सिख समुदाय काफी संख्या में भागकर असम और पूर्वोत्तर के राज्य के अलग अलग कोने में प्रवासी के तौर पर रहने लगे थे, तो उनमें से कुछ सिखों ने त्रिपुरा के चांदमारी में भी अपना डेरा डाला था। यहां रहते हुए सिखों ने अपनी परंपरा और संस्कृति को बनाये रखने के लिए गुरुद्वारा साहिब अगरतला का निर्माण भी कराया और वो त्रिपुरा की संस्कृति, यहां की भाषा को भी अपनाने लगे।
हालांकि त्रिपुरा के मूल सिख पंजाब के सिखो से बिल्कुल अलग है। लेकिन ये गुरुद्वारा प्रतीक है सिखों के अपने धर्म के प्रति निष्ठा का…उसपर भरोसे का। गुरुद्वारा साहिब सभी के लिए 24 घंटे खुलासा रहता है और दशकों से सिक्खी की परंपरा को निभा रहा है। 2011 में जनगणना के आकड़ो के अनुसार यहां पर करीब 1000 सिख रहा करते थे।
सामुदायिक सभायें और मुफ्त लंगर का आयोजन
गुरुद्वारे के आसपास सिख समुदाय निवास करते है, जो त्रिपुरा का मिनी पंजाब कहलाता है। सिख समुदाय इस गुरुद्वारे के माध्यम से सामुदायिक सभायें करते है, मुफ्त लंगर का आयोजन करते है, जिसमें सबसे खास हर रविवार को होने वाला लंगर है। सिखों की समानता और सेवा की भावना के कारण लोग उनसे ज्यादा जल्दी और आसानी से जुड़ पायें, जिससे सिखों के होने वाले निजी समारोह में भी .यहां के स्थानीय समूह बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता है, जो सिखो के प्रति उनके लगाव और भाईचारे को दर्शाता है। सिख त्योंहारों, चाहे वो गुरु पर्व हो या बैशाखी, यहां सिख समुदाय नगर कीर्तन और गुरबाणी का आयोजन करता है, जिसमें यहां की प्रशानिक व्यवस्था भी पूरा समर्थन देती है। सिखों के साथ किसी तरह का कोई भेदभाव न हो इसके लिए सिख संगठन के साथ साथ यहां का प्रशासन भी पूरा ध्यान रखता है।
त्रिपुरा के सिखों को भी पंजाब के सिखो से भेदभाव
हालांकि हाल के कुछ सालों में पंजाब के सिख भी त्रिपुरा गए है, लेकिन वहां के स्थानीय सिखों से वो अलग है। इसलिए असम की ही तरह त्रिपुरा के सिखों को भी पंजाब के सिखो से भेदभाव झेलना पड़ता है, लेकिन उससे यहां रहने वाले सिखो को कोई खास फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि वो केवल अपने गुरुओ की बातों का अनुसरण करते है, और उनके बताये उपदेशों के अनुसार ही धर्म का पालन करते है। पश्चिम चांदमारी को त्रिपुरा का मिनी पंजाब कहा जाता है, भले ही पंजाबी भाषा आपको यहां न सुनने को मिले लेकिन सिक्खी की खूशबू, गुरबाणी की बोल, कीर्तन जरूर आपके कानों को पवित्र करते है। जो बताता है कि ये स्थान सिख समुदाय के लोगो से जुड़ा है। त्रिपुरा के मिनी पंजाब की कहानी आपको कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।





























