Mini punjab in Hongkong: पूरी दुनिया में चीन के कम्युनिस्ट सरकार की दादागिरी और उनकी दमनकारी नीति प्रचलित है। खासकर 1949 के बाद चीन में लागू माओ से तुंग के शासान के बाद तो चीन में धार्मिक सहिष्नुता को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया गया.. माओ से तुंग के शासन में चीन में धार्मिक लोगो को न केवल नुकसान पहुंचाया गया बल्कि उनकी धरोहरों को भी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त किया गया… बावजूद इसके इसी चीन की एक प्राशनिक राजधानी में भारत से आये सिखों ने न केवल अपनी धार्मिक पहचान को बनाये रखा बल्कि सिखों के लिए बनाये गए एकमात्र पूजा स्थल की भी रक्षा की..चीन के कई राज्यों में सिख धर्म को मानने वाले लोग है लेकिन इकलौता हॉंगकोंग ऐसा क्षेत्र है, जहां सिखों के आगे चीन के सरकार को भी झुकना पड़ा था। सिखों की आबादी ने यहां एक छोटा सा पंजाब बयाना और अपने लिए अधिकार भी हासिल किये। अपने इस वीडियो में हम हांगकांग में मौजूद मिनी पंजाब की कहानी जानेंगे, जिसमें हांगकांग में पंजाब की झलक दिखाई देती है।
हांगकांग में सिख धर्म शुरुआत
हांगकांग चीन का वो क्षेत्र है जहां पहली बार ब्रिटिश पुलिस के साथ 1867 में सिख पुलिसकर्मियों का एक दल हांगकांग पहुँचा था, उस दौरान हांगकांग पुलिस और शंघाई म्युनिसिपल पुलिस में अधिकारी के तौर पर उनकी नियुक्ति की गई थी, लेकिन 1945 में शंघाई म्युनिसिपल पुलिस फोर्स की भारतीय पुलिस यूनिट को भंग कर दिया गया जिससे ज्यादातर भारत लौट आए और कुछ सिंगापुर और हांगकांग में ही बस गए, लेकिन तब तक सिखों ने अपने लिए हांगकांग की जनता के दिलों में जगह बना ली थी। दरअसल 1901 में हांगकांग में तैनात ब्रिटिश सेना रेजिमेंट के सिख सैनिकों ने वानचाइ के क्वीन्स रोड ईस्ट पर हांगकांग का पहला गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा गुरुद्वारे का निर्माण किया। ये गुरुद्वारा वानचाइ में मौजूद सिखों की बढते प्रभाव की निशानी बना।
वानचाई में करीब 10 हजार से 15 हजार सिख
2016 के आकड़ो के अनुसार वानचाई में करीब 10 हजार से 15 हजार सिख रहा करते है। जो कि गुरूद्वारे के आसपास के इलाकों में रहते है। हालांकि दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापानी बम से ये इकलौता गुरुद्वारा बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया था और जिसे युद्ध के बाद स्थानीय सिख और गैर-सिख समुदायों के दान से फिर से बनाया गया था। जिसमें HK पुलिस फोर्स और करेक्शनल सर्विसेज़ के सिख कर्मचारियों का बड़ा योगदान रहा था, वहीं माओ से तुंग के शासन के बाद तो पूरे चीन में बचे सिख भी हांगकांग के इस इलाके में आकर बसने लगे थे। इतना ही नहीं सिखों के प्रभाव के कारण मूल कैंटोनीज़ हांगकांग के लोगों ने भी सिख धर्म अपनाना शुरु कर दिया। लेकिन 1980 में इस गुरुद्वारे का विस्तार किया गया था, लेकिन 2013 में दीवार जर्जर होने लगी और गुरुद्वारे पर रोक लगा दी गई, जिसके बाद नए गुरुद्वारे का निर्माण शुरु हुआ।
खालसा दीवान सिख मंदिर की इमारत
मौजूदा समय में जो इमारत गुरुद्वारे के रूप में खड़ी है वो 2022 में बन कर तैयार हुई है, जिसमें 200 मिलियन HKD से ज़्यादा की लागत आई थी, इसे सिख समुदाय ने ही चंदा इकट्ठा करके बनाया था। इस गुरुद्वारे को खालसा दीवान सिख मंदिर कहा जाता है। 76,000 वर्ग फुट में बने इस सफेद इमारत में एक बड़ा प्रार्थना हॉल, एक लाइब्रेरी, कई क्लासरूम और कॉन्फ्रेंस रूम हैं, जो हांगकांग में रहने वाले सिख बच्चों को सिख धर्म से जुड़ी शिक्षाओं को देने का काम करते है, ताकि सिखों के असली कहानी, उनके बलिदान और साहस की कहानी उन तक पहुंच सकें। ये गुरुद्वारा वानचाइ में रहने वाले खालसा समुदाय के 15000 सिखों का केंद्र माना जाता है।
सामाजिक कार्यक्रम और सामुदायिक सम्मेलन
सिख समुदाय अपने गुरुद्वारे में सामाजिक कार्यक्रम और सामुदायिक सम्मेलन करके हांगकांग में मौजूद सिखो के भले के लिए, नगर कीर्तन हो, या संगत, त्योंहारों में जूलूस निकालना हो या दूसरे धार्मिक कार्यक्रम, सब कुछ गुरुद्वारा खालसा दीवान से ही आयोजित किया जाता है। रोजाना यहां लंगर का आयोजन होता है, सैकड़ों सिख सिर झुकाने आते है। जो बताता है कि भले ही वानचाई में सिखों की संख्या कम है लेकिन वो पूरी तरह से संगठित और मजबूत समुदाय है।
वानचाय में सिखों का इतिहास करीब 150 साल पुराना
वानचाय में सिखों का इतिहास करीब 150 साल पुराना है, लेकिन समय समय पर होने वाले युद्ध और तनाव के कारण सिखों को नुकसान भी झेलना पड़ा है, मगर सिखों ने अपनी प्रशानिक सेवा और अन्य क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी को दर्ज कर बताया है कि भले ही वो भारत से ताल्लुक रखते है लेकिन अब वो हांगकांग की मिट्टी में घुल गए है। वानचाय उनका अपना क्षेत्र बन गया है, जहां की गलियों में आपको सिखों की मौजूदगी, सिख गुरुबाणी की गूंज, अरदास का संगीत सुनने को मिलता है।
वानचाई में रहने वाले सिखों के लिए ये उनका मिनी पंजाब है, जो नए लोग वहां जाते है उन्हें इस जगह पर अजनबियों जैसा महसूस ही नही होता है। हांगकांग में सिखो को उनकी धार्मिक पहचान के साथ प्रशानिक सेवा देने का अधिकार है, अपने हिसाब से अपने धर्म को मानने और अपनी परंपरा संस्कृति को मानने का अधिकार है, जिससे कारण हांगकांग पूरे चीन में सिखों के लिए सबसे पसंदीदा स्थान है। हांगकांग के मिनी पंजाब की कहानी आपको कैसी लगी हमें कमेंट करक जरूर बतायें।





























