वनवासी रामपंथी लोग, जो राम की मूर्ति की नहीं करते पूजा लेकिन पूरे शरीर पर लिखवाते हैं राम का नाम

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 06 Jan 2024, 12:00 AM | Updated: 06 Jan 2024, 12:00 AM

त्रेतायुग में भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था इस युग में राम ने रावण का वध किया जिसे हर साल बुराई पर सच्चाई की जीत के रूप में याद किया जाता है. जहाँ देश-विदेश में राम के भक्तों की करोड़ो में संख्या है तो वहीं राम भक्ति का अनोखा नजारा छत्तीसगढ़ में भी देखने को मिला. जहाँ पर लोगों के सिर से लेकर पैर यानी रोम रोम में राम राम बसें हैं.

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122 साल पहले शुरू हुआ थे ये रामनामी समाज

छत्तीसगढ़ में जिन लोगों के रोम रोम राम है वो लोग रामनामी समाज के हैं जो जांजगीर चांपा जिले में 122 साल पहले शुरू हुआ था. ये समाज राम की मूर्ति पूजा नहीं करता है लेकिन इस समाज के लोगों ने राम नाम को कण कण में बसाने का काम किया. इस संप्रदाय से जुड़े लोग पूरे शरीर पर राम राम का नाम गुदवाते हैं. इसी के साथ राम राम लिखे कपड़े का धारण करते हैं. मयूर पंख से बने मुकुट पहनते हैं. घरों में राम राम लिखवाते हैं और एक दूसरे से मिलने पर नमस्कार की जगह राम राम बोलते हैं साथ ही एक दूसरे को राम राम ही कहकर पुकारते हैं.

Forest-dwelling Rampanthi people

इस समाज की स्थापना 1890 के आसपास हुई थी जो जांजगीर चांपा के एक छोटे से गांव चारपारा में दलित युवक परशुराम ने की थी. वहीं इस दौर को दलित आंदोलन के रूप में देखा जाता है क्योंकि रामनामी समाज से जुड़ने वाले लोगों की संख्या दिनोंदिन बढ़ने लगी.

रामनामी समाज में टैटू की क्या है खासियत

रामनामियों को राम राम शरीर पर गुदवाना अनिवार्य है. गोदना करवाने के बाद समाज में अलग पदवी का विभाजन होता है. वहीं इस राम नाम का टैटू गोदने को लेकर समाज के महासचिव गुलाराम रामनामी ने बताया कि, राम राम से अभिवादन करने वाले और शरीर के किसी भी हिस्से में राम नाम लिखवाने वाले को रामनामी कहते है. माथे पर दो बार राम का नाम गुदवाने वाले शिरोमणी कहलाते हैं. पूरे माथे पर राम राम नाम लिखवाने वाले को सर्वांग कहते हैं और शरीर के प्रत्येक हिस्से पर यानी सिर से लेकर पैर तक राम राम का नाम लिखवाने वाले को नखशिख कहा जाता है.

इस वजह से शरीर पर बनाया राम राम का टैटू

Forest-dwelling Rampanthi people
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रामनामियों में भजन के सारे शब्द राम राम हैं, रामनानी मंदिर नहीं जाते हैं, अयोध्या के राम भगवान की मूर्ति की पूजा नहीं करते हैं क्योंकि ये मानते हैं कि राम भगवान कण कण में बसते हैं. राम समाज के लोगों की सांसों और तन में हैं. रामानामी समाज के गुलाराम रामनामी बताते हैं कि पहले के दौर में दलितों को मंदिरों से दूर रखा गया. कपड़े और कागज में राम लिखवाने पर मिटाए जा सकते थे. इसलिए पूर्वजों ने अपने मस्तक पर राम राम का स्थायी नाम लिखवाया.

इसी के साथ राज्य में रामनामी समाज का बड़े भजन मेला प्रसिद्ध है. इस मेले में देश विदेश के लोग शामिल होने आते हैं. हर साल अलग अलग जगहों पर बड़े भजन मेले का आयोजन किया जाता है. इस मौके पर संप्रदाय के लोग आपस में मिलते हैं और नए लोगों को रामनामी संप्रदाय की दीक्षा दी जाती है.

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