Budhi Diwali 2025: देवभूमि में अनूठी परंपरा! 1 नवंबर को मनेगी बूढ़ी दिवाली

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Published: 31 Oct 2025, 12:00 AM | Updated: 31 Oct 2025, 12:00 AM

Budhi Diwali 2025: ‘बूढ़ी दिवाली’ का पर्व भारत के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश के सिरमौर और कुल्लू के निरमंड क्षेत्र में, साथ ही उत्तराखंड (Uttarakhand) के ग्रामीण इलाकों में, जहां इसे ‘इगास बग्वाल’ (Igas Bagwal) के नाम से भी जाना जाता है, प्रचलित है। ये त्यौहार दिवाली के 11 दिन बाद मनाया जाता है। कहाँ जाता है बुराई पर अच्छाई की जीत को लेकर ये पर्व मनाया जाता हैं। लेकिन उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में इसका एक अलग ही रूप देखने को मिलता है। तो चलिए इस लेख में जानते हैं इस साल बूढ़ी दिवाली पहाड़ी इलाको में कब और किस दिन मनाई जाएगी।

कब और किस दिन मनाई जाएगी बूढ़ी दिवाली

बूढ़ी दिवाली, जिसे इगास बग्वाल भी कहा जाता है, यह साल 2025 में 1 नवंबर, शनिवार को मनाई जाएगी। यह तिथि उन स्थानों के लिए है जहां यह उत्सव मुख्य दिवाली के लगभग 11 दिन बाद, कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाने की परंपरा है, जैसे कि उत्तराखंड में। वही कुछ पहाड़ी इलाको में 15 दिन मनाई जाती हैं। वही मैदानी इलाकों में दिवाली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाती है, जबकि उत्तराखंड में यह त्यौहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी या देव प्रबोधिनी एकादशी को मनाया जाता है। “इगास” का अर्थ है “ग्यारह”, यानी एकादशी का दिन, और “बग्वाल” का अर्थ है “रोशनी का त्योहार”।

बूढ़ी दिवाली 11 दिन बाद क्यों मनाई गई?

उत्तराखंड में इस दिन ढोल-दमाऊं धुन और पारम्परिक पकवान (आरसे और पूए) के साथ ये त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। साथ ही ये भी कहाँ जाता है कि जब भगवान राम रावण का वध करके अयोध्या लौटे और दिवाली मनाई गई, तब पहाड़ों के दूर-दराज के क्षेत्रों में संचार के साधनों की कमी के कारण यह शुभ सूचना 11 दिन बाद पहुँची। जिस कारण उत्तराखंड में ‘इगास बग्वाल’ इसलिए दिवाली के 11 दिन बाद (एकादशी को) मनाई जाती है। वही हिमाचल के कुछ क्षेत्रों में यह खबर एक महीने बाद पहुँची, इसलिए वहाँ एक महीने बाद दिवाली मनाई जाती है।

पारंपरिक वेशभूषा में लोकगीत

आपको बता दें, बूढ़ी दिवाली के दौरान उत्तराखंड के लोग पारंपरिक वेशभूषा में लोकगीत गाते हैं, फोक डांस करते हैं और युवा चीड के पेड़ के टहनियों की मशालें जलाकर नाच करते हैं (जिसे पहाड़ी भाषा में ‘भैलो’ भी कहते हैं) इतना ही नहीं पहाड़ी परम्परा के अनुसार लोग अपने घरो के चौक पर ऐपन (चावल के घोल से बनाए पारंपरिक डिजाईन) बनाते हैं और घर के चारो और दीप जलाते हैं।

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