Bihar Liquor Ban: बिहार में पिछले करीब एक दशक से शराबबंदी लागू है, जिसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपना ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ माना। लेकिन बिहार में सालों से शराबबंदी है, तो अब अचानक से इसे खत्म करने की बात कहां से उठने लगी? यह सवाल इसलिए और भी बड़ा हो जाता है क्योंकि बिहार में ऐतिहासिक जीत के बाद भाजपा की गठबंधन वाली एनडीए सरकार में नीतीश कुमार 10वीं बार मुख्यमंत्री बन गए हैं। सत्ता में इस नई और मजबूत पारी के बावजूद, अब उनके अपने ही साथी (NDA के सहयोगी) इस कानून को खत्म करने या इसकी समीक्षा करने की मांग कर रहे हैं। आखिर 10वीं बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले नीतीश के सामने उनके अपनों ने ही यह चुनौती क्यों खड़ी कर दी है?
मांझी ने उठाई समीक्षा की मांग
इस बहस की शुरुआत जीतन राम मांझी ने की। वह हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के संस्थापक और केंद्र सरकार में मंत्री हैं। मांझी का कहना है कि शराबबंदी कानून के कारण अब तक 8 लाख से ज्यादा लोग मुकदमों में फंसे हैं, जिनमें बड़ी संख्या वंचित वर्गों की है। गया में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि शराब बंदी से राज्य को भारी राजस्व नुकसान हो रहा है और इस पर मुख्यमंत्री को ध्यान देना चाहिए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “शराबबंदी लागू नहीं हो रही, बल्कि होम डिलीवरी हो रही है।”
मांझी के मुताबिक अदालतों में लंबित 8 लाख मामलों में से करीब 3.5 से 4 लाख मामले गरीब और वंचित वर्गों के खिलाफ हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जहरीली शराब गरीबों की जान ले रही है, क्योंकि वही सस्ती दर पर उपलब्ध होती है। हालांकि उन्होंने साफ किया कि शराबबंदी नीति गलत नहीं है, बल्कि इसके लागू करने में खामियां हैं। उनका आरोप है कि छोटे लोगों को गिरफ्तार किया जाता है, जबकि बड़े तस्कर पैसे देकर बच निकलते हैं।
कुशवाहा की पार्टी ने भी उठाए सवाल
मांझी की मांग को उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) का भी समर्थन मिला। पार्टी के विधायक माधव आनंद ने सदन में कहा कि कानून बनने के बावजूद शराब होम डिलीवरी से उपलब्ध है और राज्य को राजस्व नुकसान हो रहा है। उन्होंने कानून की विस्तृत समीक्षा की मांग की, हालांकि सरकार ने इसे खारिज कर दिया।
मांग को लेकर जेडीयू ने क्या कहा
दूसरी तरफ जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने समीक्षा की मांग को हास्यास्पद बताया। पार्टी प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि शराबबंदी कानून सभी दलों की सहमति से पारित हुआ था, इसलिए अब समीक्षा की जरूरत नहीं है। उन्होंने दावा किया कि शराबबंदी के बाद जनता का विश्वास बढ़ा है और महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ है।
एनडीए के सहयोगी दलों की मांग के बाद अब सबकी नजरें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर टिकी हैं। शराबबंदी उनकी सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक रही है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार कानून में कोई बदलाव या समीक्षा के लिए तैयार होती है या नहीं।





























