Supreme Court stays UGC: देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा लागू किए गए नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। गुरुवार को हुई सुनवाई में शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘यूजीसी प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेग्युलेशंस 2026’ के प्रावधानों में पहली नजर में ही अस्पष्टता दिखाई देती है और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए 19 मार्च तक जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में बयानबाजी तेज हो गई है। जहां बीजेपी ने इसे संविधान, सामाजिक समरसता और सनातन मूल्यों की रक्षा से जुड़ा फैसला बताया, वहीं विपक्षी दलों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई नजर आई।
क्या है यूजीसी का नया नियम? (Supreme Court stays UGC)
यूजीसी ने देश भर के सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव और घटनाओं को रोकने के लिए नए नियम लागू किए थे। इन नियमों का मकसद कैंपस में समानता और सुरक्षा सुनिश्चित करना बताया गया था। हालांकि, इन प्रावधानों को लेकर यह सवाल उठने लगे कि उनकी भाषा साफ नहीं है और गलत इस्तेमाल की गुंजाइश बनी हुई है। इसी को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट ने इन पर अंतरिम रोक लगा दी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियमों में कई ऐसे बिंदु हैं जो स्पष्ट नहीं हैं। कोर्ट का मानना है कि अगर कानून की भाषा और भावना दोनों साफ न हों, तो उसका गलत इस्तेमाल हो सकता है। इसी वजह से अदालत ने केंद्र सरकार और यूजीसी से जवाब तलब किया है और अगली सुनवाई तक नियमों के अमल पर रोक लगाने का आदेश दिया।
बीजेपी ने मोदी-शाह को दिया श्रेय
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बीजेपी नेताओं ने खुलकर खुशी जताई। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि वह इस फैसले के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का धन्यवाद करते हैं। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं किया और उन्होंने ही आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण देकर गरीबों के हित में बड़ा कदम उठाया। गिरिराज सिंह के मुताबिक यह फैसला भारत की सांस्कृतिक एकता और सनातन मूल्यों की रक्षा की दिशा में अहम है।
बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने भी विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि जो लोग यूजीसी को कोस रहे थे, उन्होंने संसद में इस मुद्दे पर चर्चा तक नहीं की। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार पर भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि देश का कानून संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत ही चलता है और सुप्रीम कोर्ट ने उसी भावना के अनुरूप फैसला दिया है।
राज्य सरकारों के नेताओं की प्रतिक्रिया
उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का कोई भी फैसला सम्मान के योग्य होता है। उन्होंने कहा कि कोर्ट के आदेश पर टिप्पणी करने की जरूरत नहीं है और सरकार उसका पूरी तरह पालन करेगी। बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने भी कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करेगी।
बीजेपी सांसद मनन कुमार मिश्र ने कहा कि शिक्षा मंत्री पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा और अब कोर्ट के फैसले के बाद सरकार को नियमों की खामियां दूर करने का मौका मिला है। वहीं बीजेपी नेता बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि नए नियम एक समुदाय को निशाना बनाते दिख रहे थे और इससे सामाजिक टकराव की आशंका थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने समय रहते रोक दिया।
सपा, बसपा और टीएमसी ने फैसले का किया स्वागत
विपक्षी खेमे में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि सच्चा न्याय वही है जिसमें किसी के साथ अन्याय न हो। कानून की भाषा भी साफ होनी चाहिए और नीयत भी।
बसपा अध्यक्ष मायावती ने कहा कि इन नए नियमों से देश में सामाजिक तनाव का माहौल बन गया था और कई जगहों पर इसके खिलाफ प्रदर्शन भी हुए। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला मौजूदा हालात में बिल्कुल सही है। उन्होंने कहा कि अगर यूजीसी ने पहले सभी हितधारकों से बातचीत की होती, तो हालात यहां तक नहीं पहुंचते।
टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा कि यूजीसी की गाइडलाइन असंवैधानिक थी, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने सही कदम उठाया। शिवसेना (यूबीटी) के प्रवक्ता ने भी कहा कि अदालत ने अगर रोक लगाई है, तो नियमों में जरूर कमियां रही होंगी।
कांग्रेस और आरजेडी का बीजेपी पर हमला
कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए बीजेपी पर तीखा हमला बोला। कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने कहा कि सरकार असली मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए जाति और वर्ग के नाम पर माहौल बना रही है। कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन ने कहा कि यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है और सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव न हो।
टीएस सिंह देव ने कहा कि समाज के कमजोर वर्गों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन ऐसे कानून बनाते वक्त यह भी देखना चाहिए कि उससे किसी और का अहित न हो।
आरजेडी ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरते हुए आरोप लगाया कि यह सब चुनावी रणनीति का हिस्सा है। राज्यसभा सांसद मनोज झा ने न्यायिक तटस्थता पर सवाल उठाए, जबकि पार्टी प्रवक्ता सारिका पासवान ने इसे चुनावी ‘जुमला’ करार दिया।
अन्य नेताओं और हस्तियों की राय
आरएलपी सांसद हनुमान बेनीवाल ने कहा कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से अपना पक्ष रखना चाहिए और जो भी छात्र रैगिंग या अपमानजनक व्यवहार करता है, उसे सजा मिलनी चाहिए। CPI सांसद जॉन ब्रिटास ने कहा कि यूजीसी की गाइडलाइंस सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का नतीजा थीं, लेकिन सरकार ने उन्हें कमजोर कर दिया।
कवि कुमार विश्वास ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि देश इस वक्त किसी भी तरह के बंटवारे को सहन करने की स्थिति में नहीं है और सरकारों को ऐसी राजनीति से बचना चाहिए जो समाज में और दरारें पैदा करे।
आगे क्या?
अब सभी की नजर 19 मार्च पर टिकी है, जब केंद्र सरकार और यूजीसी सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करेंगे। तब तक यूजीसी के नए नियमों पर रोक जारी रहेगी और यह देखना दिलचस्प होगा कि आगे कोर्ट क्या रुख अपनाता है।
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