Wheelchair rules at airport: अगर आप अक्सर एयरपोर्ट जाते हैं तो आपने यह नज़ारा जरूर देखा होगा बोर्डिंग गेट पर खड़ा एक यात्री, फोन पर रील्स देखता हुआ, जिसे एक ग्राउंड स्टाफ व्हीलचेयर पर धकेलते हुए ले जा रहा है। सवाल यह है कि क्या ये सभी लोग वाकई चल नहीं सकते? 2024 में CISF के एक सर्वे ने इस बहस को और तेज कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय एयरपोर्ट्स से इंटरनेशनल फ्लाइट पकड़ने वाले करीब 12 फीसदी यात्री व्हीलचेयर बुक करते हैं। यानी हर आठवां यात्री।
बेशक, बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें सच में चलने-फिरने में दिक्कत होती है और व्हीलचेयर उनकी जरूरत है। लेकिन यह मानना मुश्किल है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग अचानक “मेडिकली अनफिट” हो जाते हैं वो भी सिर्फ फ्लाइट के समय।
एयर इंडिया को हर महीने एक लाख से ज्यादा रिक्वेस्ट (Wheelchair rules at airport)
आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एयर इंडिया को हर महीने 1 लाख से ज्यादा व्हीलचेयर असिस्टेंस रिक्वेस्ट मिलती हैं। भारत से न्यूयॉर्क और शिकागो जैसे लंबे रूट्स पर तो हालात और गंभीर हैं, जहां करीब 30 फीसदी यात्री व्हीलचेयर की मांग करते हैं। अगर यह सही है, तो इसका मतलब है कि एक-एक फ्लाइट में 80 से 100 तक व्हीलचेयर रिक्वेस्ट आ रही हैं।
यही वजह है कि एयरलाइंस और एयरपोर्ट अथॉरिटी बार-बार अपील कर रही हैं कि इस फ्री सर्विस का गलत इस्तेमाल न किया जाए, क्योंकि यह असल में उन लोगों के लिए है जिन्हें इसकी सच में जरूरत है।
शॉर्टकट बन चुकी है व्हीलचेयर असिस्टेंस
हकीकत यह है कि कई भारतीय यात्री, न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों के एयरपोर्ट्स पर भी, इस सुविधा का गलत फायदा उठाते हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और पोस्ट्स से भारत की छवि को नुकसान होता दिख रहा है। हैरानी की बात यह है कि शर्मिंदा होने के बजाय कुछ लोग इसे एक “स्मार्ट ट्रिक” मानते हैं।
व्हीलचेयर असिस्टेंस में क्या मिलता है? एक फिट-फाइन व्यक्ति आपकी व्हीलचेयर धकेलता है, आप लंबी लाइनों को बायपास करते हैं, सिक्योरिटी और इमिग्रेशन जल्दी क्लियर हो जाता है और आपको सीधे लाउंज या बोर्डिंग गेट तक छोड़ दिया जाता है। इस दौरान यात्री आराम से फोन पर वीडियो देखता रहता है। सिस्टम को मात देने का इससे आसान तरीका क्या होगा?
एयरपोर्ट का स्ट्रेस और खराब डिजाइन
इस व्यवहार की जड़ सिर्फ चालाकी नहीं, बल्कि सिस्टम की खामियां भी हैं। एयरपोर्ट वैसे ही स्ट्रेसफुल होते हैं, लेकिन भारत में हालात और मुश्किल हो जाते हैं। कई जगह ड्रॉप-ऑफ के लिए पर्याप्त सब-टर्मिनल नहीं हैं, जिससे यात्रियों को अपने गेट तक पहुंचने के लिए किलोमीटरों पैदल चलना पड़ता है।
ऊपर से पुरानी एक्स-रे मशीनें जहां आपको अपने बैग से सिक्के, चाबियां, चार्जर, बैटरी और न जाने क्या-क्या निकालना पड़ता है। फिर वही सामान वापस भरना, फिर से चेकिंग। इसके बाद कई बार बोर्डिंग पास दिखाना और पांच अलग-अलग लोगों द्वारा वही सवाल पूछे जाना। ऐसे में यात्री थक जाता है और सोचता है “जब रोल करके जा सकता हूं, तो पैदल क्यों चलूं?”
मनोविज्ञान क्या कहता है?
बिहेवियरल साइकोलॉजी इसे “इंसेंटिव-ड्रिवन रैशनलाइजेशन” कहती है। जब नियम तोड़ने की कीमत कम हो, फायदा ज्यादा हो और नियम लागू करने वाले कमजोर हों, तो अच्छे-खासे ईमानदार लोग भी खुद को सही ठहराने लगते हैं। कुछ लोग तो खुद को यह समझा लेते हैं कि वे “थोड़ी देर के लिए बीमार” हैं या बस जो सुविधा मिल रही है, उसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
इसके पीछे एक और गहरी सोच है ‘कमी वाली मानसिकता’। भारतीय समाज में अक्सर यह भावना रहती है कि मौके सीमित हैं और अगर आपने फायदा नहीं उठाया, तो कोई और उठा लेगा। ऐसे में व्हीलचेयर का गलत इस्तेमाल किसी विकलांग व्यक्ति से अधिकार छीनने जैसा नहीं, बल्कि “सिस्टम को चकमा देना” माना जाता है।
सिर्फ एयरपोर्ट की बात नहीं
यह आदत सिर्फ एयरपोर्ट तक सीमित नहीं है। लाइन तोड़ना, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी, कोटा सर्टिफिकेट का गलत इस्तेमाल, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान ये सब उसी सोच के उदाहरण हैं। हर जगह पैटर्न एक जैसा है: कमजोर नियम, शर्म की कमी और निजी फायदे की दौड़।
असल जरूरत किसे चुकानी पड़ती है?
इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा नुकसान उन लोगों का होता है जिन्हें सच में व्हीलचेयर की जरूरत होती है। जब सिस्टम पर फर्जी बोझ बढ़ता है, तो असली जरूरतमंदों को इंतजार करना पड़ता है। सवाल यही है क्या हम थोड़ी सी सहूलियत के लिए इंसानियत और जिम्मेदारी दोनों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं?































