Trending

जब दो बार कांग्रेस पार्टी ने तोड़ा प्रणब मुखर्जी का पीएम बनने का सपना

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 31 Aug 2020, 12:00 AM | Updated: 31 Aug 2020, 12:00 AM

देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 84 साल की उम्र में अपनी अंतिम सांस ली. हाल ही में वे कोरोना से संक्रमित पाए गए थे और उनकी ब्रेन सर्जरी भी हुई थी. लेकिन काफी समय से उनकी हालत में सुधार नहीं था. 5 दशक से अधिक राजनीति में वक्त गुजारने वाले प्रणब दा के जाने से सियासी गलियारों में शून्य की भावना आ गई है. उन्हें इंदिरा गांधी का काफी करीबी माना जाता था. बताया जाता है कि प्रणब की शुरुआत से ही पीएम बनने की इच्छा थी. लेकिन उनकी ये इच्छा दो बार पूरी होते होते रह गई. आइये एक बार याद करते हैं प्रणब दा का सियासी सफरनामा.

बीजेपी सरकार में मिला भारत रत्न

देश के 13 वें राष्ट्रपति रहे प्रणब मुखर्जी राजनीति में एक साफ़ सुथरी छवि वाले चेहरे थे. ये उनकी काबिलियत थी कि उन्हें सियासत में कई उच्च पदों को संभालने की जिम्मेदारी सौंपी गई. वे देश के वित्त मंत्री और विदेश मंत्री के पद पर भी काबिज रह चुके हैं. ये उनकी उच्च शख्सियत और क्लीन चिट छवि का ही नतीजा था कि कांग्रेस में रहते हुए उन्हें बीजेपी सरकार में भारत रत्न के सम्मान से नवाजा गया. ये भी बता दें कि राजनीति में प्रवेश करने से पहले मुखर्जी ने कानून की पढ़ाई की थी. हालांकि कुछ कारणों से फिर वे राजनीति में आ गए.

खुद दिया था अपने नाम का सुझाव

इंदिरा गांधी के करीबियों में गिने जाने वाले प्रणब 1973 में कांग्रेस सरकार के मंत्री बने. पार्टी का अपने काम से विश्वास जीतने के बाद उन्हें पहली बार 1982 में वित्त मंत्री बनाया गया. हालांकि उनके निधन के बाद कुछ मनमुटाव के चलते प्रणब कांग्रेस पार्टी से अलग हो गए और राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस के नाम से अपनी नई पार्टी का गठन किया. इसके पीछे की वजह उन्हें प्रधानमंत्री न बनाया जाना बताई जाती है. कहा जाता है कि इंदिरा के निधन के समय राजीव ने प्रणब से पूछा था कि अब कौन? इस पर प्रणब का जवाब था- पार्टी का सबसे वरिष्ठ मंत्री. लेकिन ये सुझाव पार्टी को रास नहीं आया था. जिसके बाद इस बात से दुखी होकर प्रणब ने कई सालों तक पार्टी से विलय कर लिया था.

दूसरी बार ऐसे चूके

हालांकि 1989 में प्रणब और राजीव गांधी के बीच समझौता हो गया और वे फिर कांग्रेस पार्टी में वापिस लौट आये. इसके बाद पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में उन्हें साल 1991 में योजना आयोग का मुखिया बनाया गया. इसके बाद 1995 में उन्हें विदेश मंत्री का पद सौंपा गया. राजीव गांधी की हत्या होने के बाद इस बुरे समय में प्रणब पार्टी के लिए संकटमोचक बनकर उभरे. साल 2004 में उन्हें पहली बार लोकसभा के लिए चुना गया. उस दौरान विदेशी मूल के होने के चलते सोनिया गांधी को पीएम पद पर कोई नहीं देखना चाहता था. ऐसे में पीएम बनने का मुखर्जी का सपना यहां पूरा होने के काफी चांसेज थे. लेकिन इस बार भी उनके बदले मनमोहन सिंह को पार्टी ने पीएम घोषित कर दिया था. फिर 2012 में कांग्रेस ने उन्हें राष्ट्रपति चुनाव में उतारा और वह आसानी से पीए संगमा को चुनाव में हराकर देश के 13वें राष्ट्रपति बन गए. साल 2019 में बीजेपी सरकार ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया था.

vickynedrick@gmail.com

vickynedrick@gmail.com https://nedricknews.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News

Trending News

Editor's Picks

Latest News

©2025- All Right Reserved. Designed and Developed by  Marketing Sheds