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History of Turban Dastar: सिखों में केश और पगड़ी का इतिहास, क्या गुरु नानक देव जी के समय से ही शुरू हुई थी यह परंपरा?

Shikha Mishra | Nedrick News
Ghaziabad
Published: 02 Feb 2026, 08:30 AM | Updated: 02 Feb 2026, 08:30 AM

History of Turban Dastar: जब भी सिखों के पहले गुरु गुरु नानक देव जी की तस्वीर देखते है तो उसमें वो सदैव माथे पर पगड़ी पहने हुए है, यहां तक की उन बाद जितने भी गुरु हुए वो भी पगड़ी पहने हुए थे, लंबे केश रखते थे, लेकिन वो सिखो के प्रमुख पांच क कार को तब धारण नहीं करते थे, वहीं आज सिखों में पंच ककार अनिवार्य है, खासकर खालसा को मानने वाले हर सिख को दाढ़ी रखने, लंबे केश रखने और पगड़ी पहनने के लिए कहा गया है.. सिख के लिए उनकी लंबी दाढ़ी और पगड़ी धार्मिक पहचान बन चुकी है, ऐसे में सवाल ये है कि सिख धर्म में पगड़ी पहनने और दाढ़ी रखने की परंपरा कब से शुरू हुई और साथ ही सिख धर्म में ही क्यों पगड़ी पहनना, और दाढ़ी रखना अनिवार्य किया गया। अपने इस वीडियो में हम जानेंगे कि सिखों के लिए ये धार्मिक पहचान कैसे बन गए, साथ ही किसके कहने पर ये परंपरा शुरु हुई थी।

पगड़ी पहनना हिंदुओं का शान

गुरु नानक देव जी के समय में ऐसा था कि पगड़ी पहनना हिंदुओं का शान मानी जाती थी। तेज गर्मी, धूप या फिर हमलो से बचने के लिए लगभग सभी हिंदू सिर पर पगड़ी पहनते थे। हालांकि हर प्रांत में पगड़ी बांधने का तारीका अलग अलग था… लेकिन पगड़ी उनके आम जीवन का सबसे अहम हिस्सा था। लेकिन जब मुगलों ने भारत पर शासन शुरु किया तो उन्होंने सबसे पहले उनकी धार्मिक आस्था पर ही चोट पहुंचाने का प्रयास किया.. इसके लिए गैरमुसलमानों के खिलाफ कई कड़े नियम बनाये गए। हिंदुओ के साथ साथ सभी गैर मुसलमानों को सामाजिक औक धार्मिक तौर पर अपमानित करने के लिए, उनके बढ़ते ओहदे को कम करने के लिए मुगलो ने पगड़ी पहनने पर रोक लगा दी थी।

गैर मुसलमानों के घोड़े पर चढ़ने और पगड़ी पहनने से रोक

इतना ही नहीं औरंगजेब के शासन में तो जहां पगड़ी पहनने को सम्मान का प्रतीक माना जाता था, वहीं उन्हें छोटा और कमजोर दिखाने के लिए केवल शासक वर्ग के पगड़ी पहनने को अनिवार्य किया गया, ये घोषणा की गई कि केवल उच्च पद पर ही बैठे लोग पगड़ी पहन सकते है। मुगलो ने गैर मुसलमानों के घोड़े पर चढ़ने और पगड़ी पहनने से रोक लगा कर उन्हें समाजिक रूप से कमजोर करने का प्रयास किया था। लेकिन सिखों ने उनकी नीतियों को अपनाने से इंकार कर दिया था।

मुगल हमेशा सिखों के खिलाफ रहे, जिसके कारण गुरु अर्जन देव जी शहीदी हो या फिर नौवे गुरु गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी, सिख धर्म में मुगलो की दमनकारी नीति को कभी स्वीकार नहीं किया, खासकर पगड़ी न पहनने और घोड़े पर न चढ़ने की शर्त को तो उन्होंने सिरे से खारिज कर दिया था। पहले गुरु नानक देव जी से लेकर नौवे गुरु तेग बहादुर तक एक सामान्य पगड़ी पहना करते थे, लेकिन दसवें गुरु ने उस पगड़ी को सिख धर्म की सबसे बड़ी पहचान बना दिया।

कब से हुआ अनिवार्य

सिखों के लिए पगड़ी जिसे सिख दस्तार कहते है, और दाढ़ी यानि की केश  रखने की परंपरा असल में 14 अप्रैल 1699 के दिन अनिवार्य की गई थी। दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने उस दिन अपने अनुयायियों को संपूर्ण सिख बनाने के लिए पहले उन्हें अमृत चखाया था, फिर उनके लिए पंच ककार जिसमें कंघा, कच्छा, कृपाण, केश, और कड़ा धारण करना अनिवार्य किया था। उन्होंने हर खालसा सिख को केश रखने और दाढ़ी रखने का आदेश दिया था, साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि अपने केश को ढकने के लिए उन्हें दस्तार पहनना अनिवार्य किया गया था।

अमृत संचार के बाद ही गुरुसाहिब ने आनंदपुर साहिब में खालसा, जिसे शुद्ध समुदाय कहा गया, उसकी नींव रखी थी। जिसमें उन्होनें महिलाओं को कौर, यानि की राजकुमारी और पुरूषों को सिंह यानि की शेर की उपाधि दी थी, जो कि सिख धर्म में समानता, बराबरी और अलग पहचान को दर्शाता है। यानि की दसवें गुरु के आदेश से पहले सिखों के लिए पगड़ी पहनना, दाढ़ी रखना और केश रखना कोई अनिवार्य नहीं था।

गुरु ग्रंथ साहिब में क्या कहा गया

केश रखने और दाढ़ी रखने को लेकर पवित्र ग्रंथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब में जिक्र किया गया है। दरअसल जब आप हिंदू धर्म के ऐतिहासिक पौराणिक कथाओं को उठाकर देखते है तो पायेंगे कि पौराणिक समय में भी लोग केश लंबे रखा करते थे, खासकर राज परिवार और ऋषि मुनि केश रखा करते थे दाढ़ी रखा करते थे, तो केश दाढ़ी रखने की परंपरा पौराणिक समय से ही चली आ रही थी, वहीं गुरु ग्रंथ साहिब के अंग 1365 में संत कबीरदास जी की एक बाणी है, जिसके अनुसार वो कहते है जब तुम एक ईश्वर से प्रेम करते हो तो गुण और अलगाव दूर हो जाते हैं। तुम्हारे बाल लंबे हो सकते हैं या तुम अपना सिर मुंडवा सकते हो।

यानि की गुरु ग्रंथ साहिब में कहीं भी केश और दाढ़ी धारण करना अनिवार्य नहीं बताया गया है, ग्रंथ साहिब के अनुसार इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम केश रखते हो या सिर मुंडवा लेते हो, पर्क तो इस बात से पड़ता है कि आप अपने गुरु के बताये गए रास्ते पर कितना चल रहे है..गुरु का मार्ग अनुसरण करना जरूरी है हालांकि दसवें गुरु ने सिखों की धार्मिक पहचान को मजबूत करने के लिए ये नियम बनाया था। जिसे आज के समय में सिखों की सबसे बड़ी पहचान के रूप में देखा जा सकता है। यानि की हम कह सकते है कि नौवे गुरु तक जितने भी लोगो ने सिख धर्म का अनुसरण किया, उनके लिए केश, पगड़ी और दाढ़ी अनिवार्य नहीं थी.. उनके लिए केवल गुरु साहिब की शिक्षा पर चलना अनिवार्य था।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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