90 के दशक में क्रूरता का दूसरा नाम था तालिबान, महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर यूं बरपाता था कहर!

By Ruchi Mehra | Posted on 17th Aug 2021 | विदेश
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अफगानिस्तान में एक बार फिर से तालिबान के राज के लौटते ही अफरा तफरी का माहौल बन गया है। लोगों में दहशत का माहौल आ गया है। लोग डरे हुए हैं और वो आनन फानन में अपनी जान बचाकर अफगानिस्तान छोड़कर जाने की कोशिश कर रहे हैं। तालिबान को खौफ का दूसरा नाम कहा जाता है। इसकी स्थापना तो एक छोटे से गुट के तौर पर हुई थी, लेकिन देखते ही देखते ताकत बढ़ गई। 

साल 1996 वो वक्त था, जब पहली बार अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा हुआ। उस दौरान वहां काफी कुछ बदल गया। तालिबान ने तब अफगानिस्तान में इस्लामी कानून शरिया लागू किया था, जिसकी अंतरराष्ट्रीय जगत पर आलोचना भी होने लगी। 1997 तक तालिबान अफगानिस्तान में अपनी जड़े जमा चुका था। हर किसी को तालिबान के सख्त मानकों के मुताबिक ही रहना पड़ता था।

तब तालिबान ने कई सख्त कानून अफगानिस्तान में लागू कर दिए थे, जिससे वहां के लोगों की मुसीबतें लगातार बढ़ती चली गई। पुरुषों को दाढ़ी रखना अनिवार्य करने से लेकर महिलाओं का बाहर निकलना और नौकरी करने पर पाबंदी लगा दी गई। स्कूल-कॉलेजों पर रोक लगाई गई। उस दौरान अगर कोई महिला बिना बुर्का के नजर आ जाती थी, तो उसे सजा ए मौत की सजा तय हो जाती थी। 

तालिबान राज में सबसे ज्यादा कहर महिलाओं पर ही टूटा। उन्हें ना तो शिक्षा की मंजूरी थी और ना ही नौकरी करने की। सिर्फ इतना ही नहीं महिलाएं तो घर से अकेले बाहर तक नहीं निकल सकती थी। किसी पुरुष का उनके साथ होना अनिवार्य था। कोई महिला अगर किसी बात के उल्लंघन करते पाई जाती थी, तो उसे बेहद ही सख्त सजा तालिबान के द्वारा दी जाती थीं। तालिबान राज में गोलियां चलाकर मारना, महिलाओं से बलात्कार करना, हजारों लोगों को कंटेनर में बंद करके मरने के लिए छोड़ देने जैसी खबरें आम हो गई थीं। कई तालिबान और अल कायदा ह्यूमन ट्रैफिकिंग का नेटवर्क चलाते थे। वहां अल्पसंख्यक महिलाओं को गुलाम बनाकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में बेचा जाने लगा। जिसके आगे से हजारों महिलाओं ने खुदकुशी तक के रास्ते को चुनना बेहतर समझा। 

अफगानिस्तान में हिंदू और सिखों की आबादी प्रमुख अल्पसंख्यकों में रहीं। लेकिन तालिबान राज में इनका तेजी से पलायन शुरू हो गया था। तब तालिबान का कब्जा अफगानिस्तान पर था तो उको सख्त तौर पर शरिया कानून का पालन करने की हिदायत दी गई थी। उनकी संपत्तियों पर कब्जा कर लिया गया था, धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाया गया। इसके अलावा गैर मुस्लिम परिवारों को सख्त हिदायत दी जाती थी कि वो अपने मकानों के बाहर पीले रंग का बोर्ड लगाएंगे और गैर मुस्लिम महिलाएं पीले रंग के ही कपड़े पहनें। जिससे उनकी अलग से पहचान की जा सके। उन्हें मुस्लिमों से एक फासले पर चलने, बातचीत या मेलजोल नहीं करने को भी कहा जाता था। यहां तक कि हिंदू और सिख धर्म की महिलाओं को मुस्लिमों के घर जाने और उनके यहां किसी मुस्लिम के आने पर भी पाबंदी लगी हुई थीं। 

अब उस तालिबान का ही राज एक बार फिर से अफगानिस्तान पर लौट आया है। जिसके बाद तमाम लोगों की चिंताएं और डर बने हुए हैं। तालिबान के राज में अफगानिस्तान का क्या होगा, दुनियाभर की नजरें फिलहाल इस पर टिकी हुई है।  

Ruchi Mehra
Ruchi Mehra
रूचि एक समर्पित लेखक है जो किसी भी विषय पर लिखना पसंद करती है। रूचि पॉलिटिक्स, एंटरटेनमेंट, हेल्थ, विदेश, राज्य की खबरों पर एक समान पकड़ रखती हैं। रूचि को वेब और टीवी का कुल मिलाकर 3 साल का अनुभव है। रुचि नेड्रिक न्यूज में बतौर लेखक काम करती है।

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